द्यूते त्वधर्मेण जितस्य साधो:
सत्यावलम्बस्य वनं गतस्य ।
न याचतोऽदात्समयेन दायं
तमोजुषाणो यदजातशत्रो: ॥ ८ ॥
अनुवाद
युधिष्ठिर, जो कि अजातशत्रु हैं, जुए में कपटपूर्वक हराए गए। लेकिन उन्होंने सत्य का व्रत ले रखा था, इसलिए वे जंगल चले गए। जब नियत समय पर वे वापस लौटे और जब उन्होंने अपना उचित साम्राज्य वापस करने की प्रार्थना की तो मोह में डूबे हुए धृतराष्ट्र ने देने से मना कर दिया।
Yudhishthira, who is Ajatashatru, was cheated and defeated in gambling. But having taken a vow of truth, he went to the forest. When he returned after the time was over and asked for his rightful share of the empire back, the disillusioned Dhritarashtra refused to give it.
तात्पर्य
हिंदी-टेक्स्ट: महाराज युधिष्ठिर अपने पिता के राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी थे। परन्तु अपने पुत्रों विशेषतः दुर्योधन के प्रतिपक्ष में महाराज युधिष्ठिर के चाचा धृतराष्ट्र ने अपने भतीजों को उनके उचित राज्य के हिस्से से वंचित करने के बहुत अनुचित तरीके अपनाए। अंत में पाण्डवों ने पाँच गाँव माँगे, प्रत्येक पाँच भाइयों में से एक के लिए, पर वह माँग भी उन हड़प करने वालों ने ठुकरा दी। इस घटना से कुरूक्षेत्र की लड़ाई हुई। अतः कुरूक्षेत्र की लड़ाई कुरुओं ने शुरू की थी, न कि पाण्डवों ने।
क्षत्रियों होने के नाते पाण्डवों के लिए उचित कमाई का साधन केवल शासन करना ही था, न कि कोई दूसरा व्यापार करना। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य किसी भी परिस्थिति में नौकरी या व्यापार करके अपनी आजीविका चलाने के लिए स्वीकार नहीं करेंगे।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥