श्रीशुक उवाच
यदा तु राजा स्वसुतानसाधून्
पुष्णन्नधर्मेण विनष्टदृष्टि: ।
भ्रातुर्यविष्ठस्य सुतान् विबन्धून्
प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥ ६ ॥
अनुवाद
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : राजा धृतराष्ट्र अपने नालायक पुत्रों की परवरिश की दुष्ट कामनाओं में अंधे हो चुके थे, इसलिए उन्होंने अपने पिताविहीन भतीजों पाण्डवों को जलाने के लिए लोहे और लाह का बना घर बनाया।
Śrī Sukadeva Gosvāmī said: King Dhritarashtra, overcome by the impure desires of providing for his dishonest sons, lost his insight and set fire to the Lākṣāgraha to burn his fatherless nephews, the Pāṇḍavas.
तात्पर्य
धृतराष्ट्र जन्म से ही नेत्रहीन थे, पर अपने बेईमान पुत्रों का समर्थन करने हेतु अधर्मी कर्म करने में उनकी अंधता उनकी शारीरिक नेत्रहीनता से बहुत बड़ी थी। शारीरिक दृष्टि की कमी किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति में बाधक नहीं बनती है। पर जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से अंधा होता है, चाहे वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हो, वह अंधता मानव जीवन के प्रगतिशील पथ पर विपत्तिजनक रूप से हानिकारक है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥