एते चांशा-कलाः पुंसः
कृष्णस तु भगवान स्वयम
इंद्रारी-व्यकुलं लोकम
मृडयंति युगे युगे
हर सहस्राब्दि में, जब भी आज्ञाकारी शासकों के लिए कोई परेशानी होती है, तो प्रभु प्रकट होते हैं। वह अपने शुद्ध निष्कपट भक्तों की खातिर भी प्रकट होते हैं। आत्मसमर्पण करने वाले शासक और शुद्ध भक्त हमेशा प्रभु के नियंत्रण में होते हैं, और वे प्रभु की इच्छाओं के प्रति कभी भी अवज्ञा नहीं करते हैं। इसलिए प्रभु हमेशा उनकी ओर ध्यान देते हैं।
तीर्थयात्रा का उद्देश्य लगातार प्रभु को याद रखना है, और इसलिए प्रभु को तीर्थ-कीर्ति के रूप में जाना जाता है। तीर्थ स्थल पर जाने का उद्देश्य प्रभु को महिमामंडित करने का मौका पाना है। आज भी, हालाँकि समय बदल गया है, फिर भी भारत में तीर्थ स्थल हैं। उदाहरण के लिए, मथुरा और वृंदावन में, जहाँ हमें रहने का मौका मिला, लोग सुबह 4 बजे से लेकर रात तक जल्दी उठ जाते हैं और लगातार, किसी न किसी तरह से, प्रभु की पवित्र महिमा का जाप करते रहते हैं। ऐसे तीर्थ स्थल की सुंदरता यह है कि व्यक्ति अपने आप प्रभु की पवित्र महिमा को याद रखता है। उनका नाम, प्रसिद्धि, गुणवत्ता, रूप, मनोरंजन और दल सभी प्रभु के समान हैं, और इसलिए प्रभु की महिमा का जाप करना प्रभु की व्यक्तिगत उपस्थिति को आमंत्रित करता है। किसी भी समय या कहीं भी जब शुद्ध भक्त मिलते हैं और प्रभु की महिमा का जाप करते हैं, तो प्रभु निस्संदेह उपस्थित होते हैं। स्वयं प्रभु ने कहा है कि वह हमेशा वहाँ रहते हैं जहाँ उनके शुद्ध भक्त उनकी महिमा का जाप करते हैं।
