श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 1: विदुर द्वारा पूछे गये प्रश्न  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.1.42 
सोऽहं हरेर्मर्त्यविडम्बनेन
द‍ृशो नृणां चालयतो विधातु: ।
नान्योपलक्ष्य: पदवीं प्रसादा-
च्चरामि पश्यन् गतविस्मयोऽत्र ॥ ४२ ॥
 
 
अनुवाद
दूसरों द्वारा बिना देखे दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद मुझे इस पर कोई आश्चर्य नहीं है। भगवान् के कार्य जो इस नश्वर संसार के मनुष्य के कार्यों की तरह ही हैं, दूसरों के लिए अचंभित करने वाले हैं, लेकिन भगवान् की कृपा से मैं उनकी महानता को जानता हूं, इसलिए मैं सब तरह से प्रसन्न हूं।
 
Having traveled throughout the universe unnoticed by others, I am not surprised at this. The activities of the Lord, which are like those of a human being in this mortal world, are fascinating to others, but by the grace of the Lord I know His greatness and therefore I am happy in every respect.
तात्पर्य
यद्यपि वोह धृतराष्ट्र का भाई था, परन्तु विदुर बिल्कुल भिन्न था। भगवान कृष्ण के अनुग्रह से, वोह अपने भाई की भाँति मूर्ख नहीं था, और इस तरह भाई का साथ उसके ऊपर प्रभाव डाल सका। धृतराष्ट्र और उसके भौतिकवादी पुत्र अपनी शक्ति के बल पर दुनिया पर झूठा आधिपत्य करना चाहते थे। प्रभु ने उन्हे प्रोत्साहित किया, और इस तरह वोह अधिकाधिक भ्रमित होते गये। परन्तु विदुर प्रभु की निष्ठावान भक्ति सेवा प्राप्त करना चाहता था और इसलिए पूर्णतः समर्पित हो गया ईश्वर के प्रति। वह इसको अपने तीर्थयात्रा काल में अनुभूत कर सकता था, और इस प्रकार सभी शंकाओं से मुक्त हो गया। वह अपने घर और निकटतम लोगों से अलग होने के लिए बिल्कुल भी दुखी नहीं था क्योंकि अब उसे अनुभव हो गया था कि प्रभु की कृपा पर निर्भरता घर की तथाकथित स्वतंत्रता से कहीं बड़ी स्वतंत्रता है। एक व्यक्ति को किसी त्यागपूर्ण जीवन शैली में तब तक नहीं होना चाहिये जब तक कि उसे प्रभु की रक्षा पर पूरा विश्वास न हो। जीवन का यह चरण भगवद् गीता में abhayaṁ sattva-saṁśuddhiḥ के रूप में बताया गया है। हर प्राणी पूरी तरह प्रभु की दया पर निर्भर है, परन्तु जब तक कोई अस्तित्व की शुद्ध अवस्था में नहीं पहुँच जाता, तब तक वह इस अवस्था में स्थापित नहीं हो सकता। निर्भरता की इस अवस्था को sattva-saṁśuddhiḥ, या किसी के अस्तित्व की शुद्धि कहते हैं। ऐसी शुद्धि का परिणाम निर्भयता के रूप में प्रदर्शित होता है। प्रभु का एक भक्त, जिसे नारायण-पर कहा जाता है, कभी किसी से नहीं डरता क्योंकि वह हमेशा इस तथ्य से अवगत रहता है कि प्रभु हर परिस्थिति में उसकी रक्षा करते है। इस विश्वास के साथ, विदुर ने अकेले ही यात्रा की, और उसकी पहचान किसी मित्र या शत्रु के द्वारा नहीं की गई। इस प्रकार उसने दुनिया के कई कर्तव्यों के दायित्व को बिना किसी बाध्यता के जीवन की स्वतंत्रता का आनंद लिया।

जब भगवान श्रीकृष्ण भौतिक रूप से श्यामसुंदर के अपने शाश्वत, आनंदपूर्ण रूप में सांसारिक दुनिया में मौजूद थे, तब जो प्रभु के निष्ठावान भक्त नहीं थे वोह उन्हें पहचान नहीं सके या उनकी महिमा नहीं जान सके। अवाजानन्ति माम मूढ़ा मानुशी तनूम आश्रितम् (भगवद् गीता 9.11): वह हमेशा अविश्वासियों को भ्रमित करते रहते है, परन्तु उन्हें हमेशा भक्त अपनी शुद्ध भक्ति सेवा के बल पर देख सकते है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)