जब महाराजा पाण्डु की मृत्यु हुई, तो उनकी दोनों पत्नियाँ, कुंती और माध्री, अग्नि को गले लगाने के लिए तैयार थीं, लेकिन माध्री ने कुंती से छोटे बच्चों, पाँच पाण्डवों के लिए जीने का अनुरोध किया। व्यासदेव के अनुरोध पर कुंती ने इस पर सहमति जताई। अपने महान शोक के बावजूद, कुंती ने जीने का फैसला किया, अपने पति की अनुपस्थिति में जीवन का आनंद लेने के लिए नहीं, बल्कि केवल बच्चों की सुरक्षा करने के लिए। विदुर द्वारा इस घटना का उल्लेख यहाँ इसलिए किया गया है क्योंकि वे अपनी भाभी कुंतीदेवी के बारे में सभी तथ्यों को जानते थे। यह समझा जाता है कि महाराजा पाण्डु एक महान योद्धा थे और वे अकेले, धनुष और बाण की मदद से दुनिया की चारों दिशाओं को जीत सकते थे। ऐसे पति की अनुपस्थिति में, कुंती का विधवा के रूप में भी जीवित रहना लगभग असंभव था, लेकिन उन्हें पाँच बच्चों की खातिर ऐसा करना पड़ा।
