जब भगवान ब्रह्मा को इस बात को लेकर दुविधा हुई कि ब्रह्मांड में भौतिक अभिव्यक्तियों का निर्माण कैसे किया जाए और अपनी कमल सीट के साधनों और स्रोत का पता लगाने के लिए पानी के भीतर चले गए, तो उन्होंने तप शब्द को दो बार कंपन किया। तप के मार्ग पर चलना इच्छुक शिष्य का दूसरा जन्म है। उपाश्रणोत शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। यह उपनयन के समान है, या शिष्य को तप के मार्ग के लिए आध्यात्मिक गुरु के समीप लाना है। इसलिए ब्रह्माजी को इस प्रकार भगवान कृष्ण द्वारा दीक्षित किया गया था, और इस तथ्य की पुष्टि स्वयं ब्रह्माजी ने अपनी पुस्तक ब्रह्म-संहिता में की है। ब्रह्म-संहिता में भगवान ब्रह्मा ने हर छंद में गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि गाया है। इस प्रकार ब्रह्मा को कृष्ण मंत्र द्वारा, स्वयं भगवान कृष्ण द्वारा दीक्षित किया गया था, और इस प्रकार वे विशाल ब्रह्मांड का निर्माण करने से पहले वैष्णव, या भगवान के भक्त बन गए। ब्रह्म-संहिता में कहा गया है कि भगवान ब्रह्मा को अठारह अक्षर वाले कृष्ण मंत्र में दीक्षित किया गया था, जिसे आम तौर पर भगवान कृष्ण के सभी भक्तों द्वारा स्वीकार किया जाता है। हम उसी सिद्धांत का पालन करते हैं क्योंकि हम ब्रह्मा सम्प्रदाय से संबंधित हैं, सीधे ब्रह्मा से नारद तक, नारद से व्यास तक, व्यास से माधव मुनि तक, माधव मुनि से माधवेंद्र पुरी तक, माधवेंद्र पुरी से ईश्वर पुरी तक, ईश्वर पुरी से भगवान चैतन्य तक और धीरे-धीरे उनकी दिव्य कृपा भक्तिसिद्धांत सरस्वती तक, हमारे दिव्य गुरु।
जो व्यक्ति इस प्रकार शिष्य उत्तराधिकार में दीक्षित है, वह सृजन के उसी परिणाम या शक्ति को प्राप्त करने में सक्षम है। इस पवित्र मंत्र का जाप भगवान के इच्छाहीन शुद्ध भक्त का एकमात्र आश्रय है। केवल ऐसी तपस्या या तप द्वारा, भगवान का भक्त भगवान ब्रह्मा जैसे सभी पूर्णताओं को प्राप्त करता है।
