स आदिदेवो जगतां परो गुरु:
स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत ।
तां नाध्यगच्छद् दृशमत्र सम्मतां
प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् ॥ ५ ॥
अनुवाद
ब्रह्माजी, प्रथम गुरु और ब्रह्मांड के सर्वोच्च जीव होने के बावजूद, अपने कमल के आसन के स्रोत का पता नहीं लगा सके। और जब उन्होंने भौतिक जगत की सृष्टि करना चाहा, तो वे यह भी नहीं जान सके कि किस दिशा से इस कार्य को शुरू किया जाए और न ही ऐसी सृष्टि करने की कोई विधि ही ढूँढ पाए।
Despite being the first Guru and the greatest living being in the universe, Brahma could not locate the source of his lotus seat and when he wanted to create the physical world, he could not know from which direction to begin this task, nor could he find a method to create it.
तात्पर्य
यह छंद भगवान की मूर्ति और उनके निवास की अलौकिक प्रकृति को समझाने के लिए प्रस्तावना है। श्रीमद्-भागवतम की शुरुआत में यह पहले ही कहा जा चुका है कि परम निरपेक्ष सत्य अपनी निवासस्थली में भ्रामक ऊर्जा के किसी भी स्पर्श के बिना विद्यमान है। इसलिए परमेश्वर का राज्य एक मिथक नहीं है, बल्कि वास्तव में ग्रहों का एक अलग और अलौकिक क्षेत्र है जिसे वैकुंठों के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय में इसकी व्याख्या भी की जाएगी। इस भौतिक आकाश से बहुत ऊपर स्थित आध्यात्मिक आकाश और इसके उपकरणों का ऐसा ज्ञान केवल भक्ति-भाव या भक्ति-योग के कारण ही जाना जा सकता है। भगवान ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की शक्ति भी भक्ति-योग से प्राप्त हुई थी। ब्रह्मा जी सृष्टि के मामले में चकित थे, और वह अपने अस्तित्व के स्रोत का पता भी नहीं लगा सके। लेकिन यह सारा ज्ञान उन्हें भक्ति-योग के माध्यम से पूरी तरह से प्राप्त हुआ। भक्ति-योग से व्यक्ति भगवान को जान सकता है और भगवान को सर्वोच्च के रूप में जानकर, व्यक्ति अन्य सभी चीजों को जानने में सक्षम हो जाता है। सर्वोच्च को जानने वाला अन्य सभी को जानता है। यही सभी वेदों का संस्करण है। यहाँ तक कि ब्रह्मांड के पहले आध्यात्मिक गुरु को भगवान की कृपा से ज्ञान प्राप्त हुआ, तो भगवान की दया के बिना और कौन हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है? यदि कोई हर चीज़ का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, तो उसे भगवान की दया को खोजना होगा, और कोई अन्य उपाय नहीं है। किसी के व्यक्तिगत प्रयास के आधार पर ज्ञान प्राप्त करना समय की बर्बादी है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥