अथो महा-भाग भवान अमोघ-दृक्
शुचि-श्रवाः सत्य-रतो धृत-व्रतः
उरुक्रमस्याखिला-बन्ध-मुक्तये
समाधिनानुस्मर तद् विचेष्टितम्
"हे परम भाग्यवान, पवित्र हृदय वाले विद्वान, आपकी कीर्ति और यश सार्वभौमिक है और आप निर्पेक्ष सत्य में अडिग विश्वास के साथ निष्कलंक चरित्र और अचूक दृष्टि रखते हैं। मैं आपसे ईश्वर के व्यक्तित्व के उन कार्यों का ध्यान करने को कहता हूँ, जिनके कार्य अद्भुत हैं।"
इसलिए ब्रह्म परंपरा के शिष्यक्रम में योग ध्यान की साधना की उपेक्षा नहीं की जाती है। लेकिन क्योंकि भक्त भक्ति-योगी होते हैं, वे अवैयक्तिक ब्रह्म का ध्यान करने में कष्ट नहीं उठाते; जैसा कि यहाँ संकेत दिया गया है, वे ब्रह्म परमम या परम ब्रह्म का ध्यान करते हैं। ब्रह्म साक्षात्कार अव्यक्त तेजोमयता से शुरू होता है, लेकिन ऐसे ध्यान की अधिक उन्नति से परम आत्मा, परमात्मा साक्षात्कार का प्रकटीकरण होता है। और अधिक प्रगति करते हुए, ईश्वर के व्यक्तित्व के परम साक्षात्कार की स्थापना होती है। श्री नारद मुनि, व्यासदेव के आध्यात्मिक गुरु के रूप में, व्यासदेव की स्थिति को अच्छी तरह से जानते थे, और इस प्रकार उन्होंने महाव्रत आदि के साथ निर्पेक्ष सत्य में स्थिर श्रीला व्यासदेव के गुणों को प्रमाणित किया। नारद ने प्रभु की अलौकिक गतिविधियों पर ध्यान करने की सलाह दी। अव्यक्त ब्रह्म की कोई गतिविधियां नहीं होती हैं, लेकिन ईश्वर के व्यक्तित्व की कई गतिविधियां होती हैं, और ऐसी सभी गतिविधियाँ अलौकिक होती हैं, जिनमें भौतिक गुण का कोई अंश नहीं होता है। यदि परम ब्रह्म की गतिविधियां भौतिक गतिविधियाँ होतीं, तो नारद ने व्यासदेव को उन पर ध्यान करने की सलाह नहीं दी होती। और परम् ब्रह्म भगवान श्री कृष्ण हैं, जैसा कि भगवद्-गीता में पुष्टि की गई है। जब अर्जुन ने भगवान कृष्ण की वास्तविक स्थिति को समझा, तो उन्होंने भगवद् गीता के दसवें अध्याय में भगवान कृष्ण को निम्नलिखित शब्दों में संबोधित किया:
परं ब्रह्म परं धाम
पवित्रं परमं भवान
पुरुषं शाश्वतं दिव्यं
आदि-देवं अजं विभुम्
आहुस्त्वां ऋषयः सर्वे
देवर्षिर्नारदस्तथा
असितो देवलो व्यासः
स्वयं चैव ब्रवीषि मे
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के अपने साक्षात्कार द्वारा भगवद्-गीता के उद्देश्य को संक्षेपित किया और इस प्रकार कहा, "हे प्रिय ईश्वर के व्यक्तित्व, आप परम निरपेक्ष सत्य हैं, आनंद और ज्ञान के अनश्वर रूप में मूल व्यक्ति हैं, और इसकी पुष्टि नारद, असित, देवल और व्यासदेव ने की है और सबसे बढ़कर, आपके व्यक्तिगत स्व ने भी इसकी पुष्टि की है।" (भगवद्-गीता 10.12-13)
जब व्यासदेव ने ध्यान में अपना मन स्थिर किया, तो उन्होंने इसे भक्ति-योग समाधि में किया और वास्तव में सर्वोच्च व्यक्ति को माया, भ्रामक ऊर्जा के साथ विपरीत दिशा में देखा। जैसा कि हमने पहले चर्चा की है, प्रभु की माया, या भ्रम भी एक प्रतिनिधित्व है क्योंकि बिना प्रभु के माया का कोई अस्तित्व नहीं है। अंधकार प्रकाश से स्वतंत्र नहीं है। प्रकाश के बिना, कोई भी अंधकार के विपरीत अनुभव नहीं कर सकता। हालाँकि, यह माया या भ्रम ईश्वर के परम व्यक्तित्व को दूर नहीं कर सकता है, बल्कि उससे अलग खड़ा रहता है (अपाश्रयम)।
इसलिए, ध्यान की सिद्धि ईश्वर के व्यक्तित्व के साथ-साथ उनकी अलौकिक गतिविधियों की प्राप्ति है। अव्यक्त ब्रह्म पर ध्यान साधक के लिए एक परेशानी भरा काम है, जैसा कि भगवद्-गीता (12.5) में पुष्टि की गई है: क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तासक्त-चेतसाम।
