तद् विद्धि प्रणिपातेन
परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं
ज्ञानीनां तत्त्व-दर्शिनः
अर्जुन को आत्मज्ञानी व्यक्ति से आत्मसमर्पण, प्रश्न और सेवा द्वारा पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करने की सलाह दी गई थी। पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करना डॉलर के आदान-प्रदान जैसा नहीं है; इस तरह के ज्ञान को आध्यात्मिक गुरु की सेवा करके प्राप्त करना होगा। जिस तरह ब्रह्माजी ने भगवान को पूरी तरह से संतुष्ट करके सीधे उनसे ज्ञान प्राप्त किया था, उसी तरह किसी को भी आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट करके पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करना होगा। आध्यात्मिक गुरु की संतुष्टि पारलौकिक ज्ञान को आत्मसात करने का साधन है। केवल व्याकरणविद बनकर कोई पारलौकिक ज्ञान नहीं समझ सकता। वेद घोषित करते हैं:
यस्य देवे परा भक्ति
यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता ह्य अरथाः
प्रकाशंते महात्मनः
"केवल उसी व्यक्ति को पारलौकिक ज्ञान स्वतः ही प्रकट होता है जिसकी भगवान और आध्यात्मिक गुरु की प्रति अडिग भक्ति हो।" (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.23) शिष्य और आध्यात्मिक गुरु के बीच ऐसा रिश्ता शाश्वत होता है। जो अब शिष्य है वह अगला आध्यात्मिक गुरु होता है। और जब तक कोई अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति सख्ती से आज्ञाकारी न हो, तब तक वह एक वास्तविक और अधिकृत आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। ब्रह्माजी, परम भगवान के शिष्य के रूप में, वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया और उसे अपने प्रिय शिष्य नारद को प्रदान किया, और इसी तरह नारद ने, आध्यात्मिक गुरु के रूप में, यह ज्ञान व्यास को सौंप दिया और इसी तरह आगे भी। इसलिए तथाकथित औपचारिक आध्यात्मिक गुरु और शिष्य ब्रह्मा और नारद या नारद और व्यास की प्रतिकृतियां नहीं हैं। ब्रह्मा और नारद के बीच का रिश्ता वास्तविकता है, जबकि तथाकथित औपचारिकता धोखेबाज और धोखा खाने वाले के बीच का रिश्ता है। यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नारद न केवल नेक और आज्ञाकारी थे, बल्कि आत्म-नियंत्रित भी थे। जो व्यक्ति आत्म-नियंत्रित नहीं है, विशेषकर यौन जीवन में, वह न तो शिष्य बन सकता है और न ही आध्यात्मिक गुरु। बोलना, क्रोध, जीभ, मन, पेट और जननांगों को नियंत्रित करने में अनुशासनात्मक प्रशिक्षण होना चाहिए। जिसने ऊपर वर्णित विशेष इंद्रियों को नियंत्रित किया है, उसे गोस्वामी कहा जाता है। गोस्वामी बने बिना कोई शिष्य या आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। इंद्रिय नियंत्रण के बिना तथाकथित आध्यात्मिक गुरु निश्चित रूप से धोखेबाज है, और ऐसे तथाकथित आध्यात्मिक गुरु का शिष्य धोखा खाया हुआ है।
किसी को ब्रह्माजी को एक मृत परदादा के रूप में नहीं सोचना चाहिए, जैसा कि हम इस ग्रह पर अनुभव करते हैं। वे सबसे पुराने परदादा हैं, और वे अभी भी जीवित हैं, और नारद भी जीवित हैं। ब्रह्मलोक ग्रह के निवासियों की आयु का उल्लेख भगवद्-गीता में किया गया है। इस छोटे से ग्रह पृथ्वी के निवासी ब्रह्मा के एक दिन की अवधि की भी गणना कर सकते हैं।
