श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  2.9.43 
तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम् ।
देवर्षि: परिपप्रच्छ भवान् यन्मानुपृच्छति ॥ ४३ ॥
 
 
अनुवाद
जब नारद ने देखा कि समस्त ब्रह्माण्ड के प्रपितामह ब्रह्माजी मुझ पर प्रसन्न हैं, तो महर्षि नारद ने अपने पिता से विस्तार में यह भी पूछा।
 
When Narada saw that Brahmaji, the great grandfather of the entire universe, was pleased with him, then Maharishi Narada also asked his father in detail.
तात्पर्य
आत्मज्ञानी व्यक्ति से आध्यात्मिक या पारलौकिक ज्ञान को समझने की प्रक्रिया बिल्कुल वैसी नहीं है जैसे स्कूल मास्टर से कोई साधारण प्रश्न पूछना। आधुनिक दिनों में स्कूल मास्टर को कुछ जानकारी देने के लिए भुगतान किया जाता है, लेकिन आध्यात्मिक गुरु एक पेड एजेंट नहीं होते हैं। न ही वे अधिकृत हुए बिना शिक्षा दे सकते हैं। भगवद्-गीता (4.34) में पारलौकिक ज्ञान को समझने की प्रक्रिया को निर्देशित किया गया है:

तद् विद्धि प्रणिपातेन

परिप्रश्नेन सेवया

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं

ज्ञानीनां तत्त्व-दर्शिनः

अर्जुन को आत्मज्ञानी व्यक्ति से आत्मसमर्पण, प्रश्न और सेवा द्वारा पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करने की सलाह दी गई थी। पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करना डॉलर के आदान-प्रदान जैसा नहीं है; इस तरह के ज्ञान को आध्यात्मिक गुरु की सेवा करके प्राप्त करना होगा। जिस तरह ब्रह्माजी ने भगवान को पूरी तरह से संतुष्ट करके सीधे उनसे ज्ञान प्राप्त किया था, उसी तरह किसी को भी आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट करके पारलौकिक ज्ञान प्राप्त करना होगा। आध्यात्मिक गुरु की संतुष्टि पारलौकिक ज्ञान को आत्मसात करने का साधन है। केवल व्याकरणविद बनकर कोई पारलौकिक ज्ञान नहीं समझ सकता। वेद घोषित करते हैं:

यस्य देवे परा भक्ति

यथा देवे तथा गुरौ

तस्यैते कथिता ह्य अरथाः

प्रकाशंते महात्मनः

"केवल उसी व्यक्ति को पारलौकिक ज्ञान स्वतः ही प्रकट होता है जिसकी भगवान और आध्यात्मिक गुरु की प्रति अडिग भक्ति हो।" (श्वेताश्वतर उपनिषद 6.23) शिष्य और आध्यात्मिक गुरु के बीच ऐसा रिश्ता शाश्वत होता है। जो अब शिष्य है वह अगला आध्यात्मिक गुरु होता है। और जब तक कोई अपने आध्यात्मिक गुरु के प्रति सख्ती से आज्ञाकारी न हो, तब तक वह एक वास्तविक और अधिकृत आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। ब्रह्माजी, परम भगवान के शिष्य के रूप में, वास्तविक ज्ञान प्राप्त किया और उसे अपने प्रिय शिष्य नारद को प्रदान किया, और इसी तरह नारद ने, आध्यात्मिक गुरु के रूप में, यह ज्ञान व्यास को सौंप दिया और इसी तरह आगे भी। इसलिए तथाकथित औपचारिक आध्यात्मिक गुरु और शिष्य ब्रह्मा और नारद या नारद और व्यास की प्रतिकृतियां नहीं हैं। ब्रह्मा और नारद के बीच का रिश्ता वास्तविकता है, जबकि तथाकथित औपचारिकता धोखेबाज और धोखा खाने वाले के बीच का रिश्ता है। यह स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि नारद न केवल नेक और आज्ञाकारी थे, बल्कि आत्म-नियंत्रित भी थे। जो व्यक्ति आत्म-नियंत्रित नहीं है, विशेषकर यौन जीवन में, वह न तो शिष्य बन सकता है और न ही आध्यात्मिक गुरु। बोलना, क्रोध, जीभ, मन, पेट और जननांगों को नियंत्रित करने में अनुशासनात्मक प्रशिक्षण होना चाहिए। जिसने ऊपर वर्णित विशेष इंद्रियों को नियंत्रित किया है, उसे गोस्वामी कहा जाता है। गोस्वामी बने बिना कोई शिष्य या आध्यात्मिक गुरु नहीं बन सकता। इंद्रिय नियंत्रण के बिना तथाकथित आध्यात्मिक गुरु निश्चित रूप से धोखेबाज है, और ऐसे तथाकथित आध्यात्मिक गुरु का शिष्य धोखा खाया हुआ है।

किसी को ब्रह्माजी को एक मृत परदादा के रूप में नहीं सोचना चाहिए, जैसा कि हम इस ग्रह पर अनुभव करते हैं। वे सबसे पुराने परदादा हैं, और वे अभी भी जीवित हैं, और नारद भी जीवित हैं। ब्रह्मलोक ग्रह के निवासियों की आयु का उल्लेख भगवद्-गीता में किया गया है। इस छोटे से ग्रह पृथ्वी के निवासी ब्रह्मा के एक दिन की अवधि की भी गणना कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)