हरि-भक्ति-सुदय (13.2) में निम्नलिखित छंद है:
अक्ष्णो: फलं त्वादृशा-दर्शनं हि
तनो: फलं त्वादृशा-गात्र-संग:
जिह्वा-फलं त्वादृशा-कीर्तनं हि
सुदुर्लभा भगवता हि लोके
"हे भगवान के भक्त, दृश्य इन्द्रियों का उद्देश्य केवल आपको देखकर पूरा होता है, और आपके शरीर को छूना शारीरिक स्पर्श की संतुष्टि है। जीभ आपकी गुणवत्ता की प्रशंसा करने के लिए होती है क्योंकि इस संसार में भगवान का एक शुद्ध भक्त बहुत मुश्किल से मिलता है।"
मूल रूप से जीव की इन्द्रियों को इस उद्देश्य के लिए पुरस्कृत किया गया था, अर्थात् उन्हें भगवान की या उनके भक्तों की सेवा में लगाना था, लेकिन भौतिक ऊर्जा के भ्रम में फँसी आत्माएँ इंद्रियों के आनंद से वशीभूत हो गईं। इसलिए ईश्वर चेतना की पूरी प्रक्रिया इन्द्रियों की सशर्त गतिविधियों को सुधारने और उन्हें भगवान की प्रत्यक्ष सेवा में फिर से शामिल करने के लिए है। भगवान ब्रह्मा ने इस प्रकार अपनी इंद्रियों को भगवान में लगाया, जिससे सशर्त जीवों को पुनः निर्मित ब्रह्मांड में कार्य करने के लिए पुन: बनाया गया। इस प्रकार यह भौतिक ब्रह्मांड भगवान की इच्छा से निर्मित और नष्ट किया जाता है। यह सशर्त आत्मा को गृह वापसी करने का मौका देने के लिए बनाया गया है, भगवान के पास वापस आया है, और ब्रह्माजी, नारदजी, व्यासजी और उनकी संगति जैसी सेवाएँ भगवान के उसी उद्देश्य में व्यस्त हो जाती हैं: सशर्त आत्माओं को इंद्रिय संतुष्टि के क्षेत्र से पुनः प्राप्त करना और उन्हें इंद्रियों को भगवान की सेवा में संलग्न करने के सामान्य चरण में वापस लौटाना। ऐसा करने के बजाय, अर्थात इंद्रियों की क्रियाओं को बदलना, निजीवादियों ने सशर्त आत्माओं को इंद्रियों से रहित करना शुरू कर दिया, और भगवान को भी इंद्रियों से रहित कर दिया। वह सशर्त आत्माओं के लिए अनुचित व्यवहार है। इंद्रियों की रोगयुक्त स्थिति का इलाज दोष को ठीक करके किया जा सकता है, लेकिन इंद्रियों को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने से नहीं। जब आँखों में कोई बीमारी होती है, तो आँखों को ठीक से देखने के लिए ठीक किया जा सकता है। आँखों को बाहर निकालना कोई इलाज नहीं है। इसी तरह, संपूर्ण भौतिक रोग इंद्रिय संतुष्टि की प्रक्रिया पर आधारित है, और रोगग्रस्त स्थिति से मुक्ति इंद्रियों को प्रभु के सौंदर्य को देखने, उनके गौरव को सुनने और उनके खाते में कार्य करने के लिए फिर से लगे रहना है। इस प्रकार ब्रह्माजी ने पुन: सार्वभौमिक गतिविधियाँ कीं।
