एवं प्रसन्न-मनसो
भगवद्-भक्ति-योगतः
भगवत्-तत्त्व-विज्ञानं
मुक्त-संगस्य जायते
इस प्रकार, जीवन की पूर्ण संतुष्टि के चरण में, जो कि भक्तिमय सेवा करने के परिणामस्वरूप इंद्रियतृप्ति के संसार से पूर्ण विरक्ति के द्वारा प्रदर्शित होता है, जीव मुक्ति की अवस्था में ईश्वर विज्ञान को समझ सकता है।
इस पूर्ण संतुष्टि और इन्द्रियों से विमुख होने की अवस्था में, कोई भी व्याकरण अथवा अकादमिक अटकलों से नहीं बल्कि अपनी सभी गोपनीय जटिलताओं के साथ ईश्वर के विज्ञान के रहस्य को जान सकता है। क्योंकि ब्रह्मा ने स्वयं को ऐसे ग्रहण के योग्य बनाया, प्रभु ने श्रीमद-भागवत का उद्देश्य प्रकट करने की कृपा की। भगवान द्वारा किसी भी भक्त को प्रत्यक्ष निर्देश, जो इंद्रिय तृप्ति की दुनिया से अलग है, संभव है, जैसा कि भगवद-गीता (10.10) में कहा गया है:
तेषां सतत-युक्तानाम
भजतां प्रीति-पूर्वकम्
ददामि बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयान्ति ते
उन भक्तों को जो प्रभु की पारलौकिक प्रेममयी सेवा (प्रीति-पूर्वकम्) में निरंतर लगे रहते हैं, प्रभु भक्त पर अपनी अकारण दया से प्रत्यक्ष निर्देश देते हैं ताकि भक्त भगवान के पास घर लौटने के मार्ग पर सटीक प्रगति कर सके। इसलिए, किसी को भी श्रीमद-भागवतम के इन चार श्लोकों को मानसिक अटकलों से समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बल्कि प्रत्यक्ष रूप से भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की धारणा द्वारा, कोई उनके निवास, वैकुण्ठ के बारे में सब कुछ जान सकता है, जैसा कि ब्रह्माजी ने देखा और अनुभव किया था। वैकुण्ठ का ऐसा बोध प्रभु के किसी भी भक्त के द्वारा पारलौकिक स्थिति में भक्तिपूर्ण सेवा के परिणामस्वरूप संभव है।
गोपाल-तापनी उपनिषद (श्रुति) में कहा गया है, गोपा-वेशो मे पुरुषः पुरस्ताद आविरभवः: प्रभु ब्रह्मा के सामने एक चरवाहे के रूप में प्रकट हुए, अर्थात् भगवान के मूल व्यक्तित्व के रूप में, भगवान श्री कृष्ण, गोविंद, जिन्हें बाद में ब्रह्माजी ने अपने ब्रह्म-संहिता (5.29) में वर्णित किया है:
चिन्तामणि-प्रकर-सदमसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभीर अभिपालयन्तम्
लक्ष्मी-सहस्र-शता-सम्भ्रम-सेव्यमानं
गोविन्दम आदि-पुरुषं तमहं भजामि
ब्रह्माजी भगवान के मूल व्यक्तित्व, भगवान श्री कृष्ण की पूजा करना चाहते हैं, जो सबसे ऊपर वैकुण्ठ ग्रह में निवास करते हैं, जिसे गोलोक वृंदावन के नाम से जाना जाता है, जहां उन्हें एक चरवाहे के रूप में सुभरी गायों को रखने की आदत है और जहां हजारों देवियों (गोपियों) द्वारा उन्हें प्यार और सम्मान के साथ सेवा दी जाती है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण सर्वोच्च भगवान (कृष्णस्तु भगवान स्वयं) के मूल रूप हैं। यह इस निर्देश से भी स्पष्ट है। भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व भगवान कृष्ण हैं, और प्रत्यक्ष रूप से नारायण या पुरुष-अवतार नहीं, जो बाद की अभिव्यक्तियाँ हैं। इसलिए श्रीमद-भागवत का अर्थ है भगवान श्री कृष्ण सर्वोच्च व्यक्तित्व के चैतन्य, और श्रीमद-भागवत भी भगवान का ध्वनि प्रतिनिधित्व है जितना कि भगवद-गीता है। इस प्रकार निष्कर्ष यह है कि श्रीमद-भागवत प्रभु का विज्ञान है जिसमें प्रभु और उनके निवास को पूरी तरह से महसूस किया जाता है।
