स्वयंभू शास्त्र इस लक्ष्य के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश देते हैं, किंतु क्योंकि भ्रमित जीवन अंधकार में रमते रहते हैं, वे स्वयंभू शास्त्रों के सत्य को पा नहीं पाते। जैसे की भागवद्गीता में संपूर्ण ध्यान भगवान श्री कृष्ण पर है, किंतु ब्रह्माजी या अर्जुन नामक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के अभाव में अधिकृत रहित अनेक व्यक्ति स्वयंभू ज्ञान को अलग-अलग प्रकार से गलत साबित करते रहते हैं। बिना संदेह भागवद्गीता आध्यात्मिक आकाश के क्षितिज पर सबसे चमकीले तारों में से एक है, फिर भी इस महाज्ञान की व्याख्या को काफी हद तक गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है जो कि भागवद्गीता के हर छात्र को भौतिक प्रतिबिंब के अंधेरे में ही रहने को कहती है। ऐसे छात्र भागवद्गीता से शायद ही प्रकाशित होते हैं। गीता में लगभग वही उपदेश दिया गया है, जो कि भागवतम के पहले चार स्तोत्र में भी दिया गया है, किंतु गलत और फैशनेबल व्याख्या के कारण अधिकृत व्यक्ति अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँच सकते। भागवद्गीता (18.61) में स्पष्ट तौर पर कहा गया है:
ईश्वर: सर्व-भूतानां
हृद-देशेऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयं सर्व-भूतानि
यंत्रारूढ़ानि मायाया
भगवान सभी जीवित प्राणियों के हृदय में (परमात्मा के रूप में) स्थित हैं और वह अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से भौतिक संसार में उन सभी को नियंत्रित करते हैं। इसलिए यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि भगवान सर्वोच्च नियंत्रक हैं और जीवित प्राणी भगवान द्वारा नियंत्रित रहते हैं। भागवद्गीता (18.65) में भगवान निम्न प्रकार से आदेश देते हैं:
मन-मना भव मद-भक्तो
मद-याजी माँ नमस्करु
माँ एवैष्यसि सत्यम् ते
प्रतिजाने प्रियो'सि मे
भागवद्गीता के इस स्तोत्र से यह निश्चित हो जाता है कि भगवान की आज्ञा है कि हमें ईश्वर के लिए मन होना चाहिए, भगवान के भक्त बनना चाहिए, भगवान का पूजन करना चाहिए, और भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त निश्चित तौर पर भगवान के पास, अपने घर लौट जाएगा।
संकेत रूप से यह कहा जाता है कि मनुष्य समाज के वैदिक सामाजिक निर्माण को इस प्रकार बनाया गया है कि हर कोई भगवान के शरीर का एक अंग माना जाता है। बुद्धिमान वर्ग के लोग या ब्राह्मण, भगवान के चेहरे पर स्थित हैं; प्रशासनिक वर्ग के लोग या क्षत्रिय, भगवान की भुजाओं पर स्थित हैं; उत्पादन वर्ग के लोग या वैश्य, भगवान की कमर पर स्थित हैं; और श्रमिक वर्ग के लोग या शूद्र, भगवान के चरणों पर स्थित हैं। इसलिए संपूर्ण सामाजिक संरचना ही भगवान का शरीर है, और शरीर के सभी अंग, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, भगवान के पूरे शरीर की खुशी से सेवा करने के लिए हैं; अन्यथा अंग एकजुट चेतना के साथ समन्वित होने के लिए अयोग्य हो जाएँगे। सार्वभौमिक चेतना भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की समन्वित सेवा से प्राप्त की जा सकती है और केवल वहीं पूर्णता सुनिश्चित हो सकती है। इसलिए महान वैज्ञानिक, महान दार्शनिक, महान मानसिक सट्टेबाज, महान राजनीतिज्ञ, महान उद्योगपति, महान समाज सुधारक, आदि भी भौतिक संसार के अस्थिर समाज को कोई राहत नहीं दे सकते क्योंकि वह सफलता के रहस्य को नहीं जानते हैं। जैसा की भागवतम के इस स्तोत्र में उल्लेख किया गया है, अर्थात भक्ति-योग के रहस्य को जानना चाहिए। भागवद्गीता (7.15) में कहा गया है:
ना माँ दुष्कृतीनो मूढ़ा:
प्रपद्यन्ते नराधमा:
मायापहृत-ज्ञाना
आसुरं भावम आश्रिता:
क्योंकि मानव समाज के तथाकथित महान नेता भक्ति-योग के इस महान ज्ञान से अनजान हैं और सदैव इन्द्रिय तृप्ति के अधम कार्यों में लिप्त रहते हैं, भगवान की बाह्य ऊर्जा से विलक्षण, वे ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व के वर्चस्व के प्रति हठी विद्रोही हैं, और वे कभी भी उनके प्रति समर्पण करने के लिए सहमत नहीं हैं क्योंकि वे मूर्ख हैं, दुष्ट हैं और मानव प्राणियों का निम्नतम प्रकार हैं। ऐसे विश्वासहीन नास्तिक पद की भौतिक भाव से अत्यधिक शिक्षित हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे संसार के सबसे बड़े मूर्ख हैं क्योंकि बाहरी, भौतिक प्रकृति के प्रभाव से ज्ञान का उनका तथाकथित अर्जन शून्य और शून्य हो गया है। इसलिए चीजों के वर्तमान संदर्भ में ज्ञान के सभी उन्नति का दुरुपयोग बिल्लियों और कुत्तों द्वारा किया जा रहा है जो इंद्रिय संतुष्टि के लिए एक दूसरे से लड़ रहे हैं, और विज्ञान, दर्शन, ललित कला, राष्ट्रवाद, आर्थिक विकास, धर्म और महान गतिविधियों में ज्ञान के सभी अधिग्रहण का इस्तेमाल करके खराब किया जा रहा है। मृत व्यक्ति के लिए कपड़े के रूप में। एक मृत शरीर के ताबूत को ढंकने के लिए उपयोग किए जाने वाले कपड़े में कोई उपयोगिता नहीं है, अज्ञानी जनता से झूठी वाहवाही प्राप्त करने के अलावा। श्रीमद्-भागवतम इसलिए बार-बार कहता है कि भक्ति-योग की स्थिति की प्राप्ति के बिना, मानव समाज की सभी गतिविधियों को केवल पूर्ण विफलता माना जाना है। ऐसा कहा गया है:
परभवास तावद बोधजातो
यावन न जिज्ञासता आत्म-तत्वम्
यावत क्रियास तावदिदं मनो वै
कार्मात्मकं येन शारीर-बंधः
(भागवतम् 5.5.5)
जब तक कोई आत्म-साक्षात्कार के बारे में पूछताछ करने के लिए अंधा है, सभी भौतिक गतिविधियाँ, चाहे वे कितनी भी महान क्यों न हों, सभी विभिन्न प्रकार की हार हैं क्योंकि मानव जीवन का उद्देश्य ऐसी अवांछित और लाभहीन गतिविधियों से पूरा नहीं होता है। मानव शरीर का कार्य भौतिक बंधन से मुक्ति प्राप्त करना है, लेकिन जब तक कोई भौतिक गतिविधियों में पूरी तरह से अवशोषित है, तब तक उसका मन पदार्थ के भँवर में अभिभूत रहेगा, और इस तरह वह जीवन भर भौतिक शरीरों में बंदी बना रहेगा:
एवं मनः कर्म-वशं प्रयुङक्ते
अविद्यायत्मन्य उपधीयामाने
प्रिति न यावन मायि वासुदेवे
न मुच्यते देह-योगेन तावत
(भागवतम् 5.5.6)
यह मन है जो विभिन्न प्रकार के दुखों को पीड़ित करने वाले विभिन्न प्रकार के शरीर उत्पन्न करता है। इसलिए जब तक मन फलदायी गतिविधियों में लीन है, तब तक मन को अज्ञान में लीन माना जाता है, और इस प्रकार किसी को बार-बार अलग-अलग शरीरों में भौतिक बंधन के अधीन होना निश्चित है जब तक कि कोई ईश्वर, वासुदेव, सर्वोच्च व्यक्ति के लिए पारलौकिक प्रेम विकसित नहीं कर लेता है। सर्वोच्च व्यक्ति, वासुदेव के पारलौकिक नाम, गुण, रूप और गतिविधियों में लीन होना, मन के स्वभाव को पदार्थ से पूर्ण ज्ञान में बदलना है, जो किसी को पूर्ण बोध के मार्ग पर ले जाता है और इस तरह किसी को भौतिक संपर्क और विभिन्न भौतिक के प्रति बंधन से मुक्त करता है शरीर।
इसलिए श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद ने सर्वत्र सर्वदा शब्दों पर इस अर्थ में टिप्पणी की है कि भगवान के प्रति भक्ति-योग या भक्ति सेवा के सिद्धांत सभी परिस्थितियों में उपयुक्त हैं; अर्थात्, सभी प्रकट शास्त्रों में भक्ति-योग की सिफारिश की गई है, यह सभी अधिकारियों द्वारा किया जाता है, यह सभी स्थानों में महत्वपूर्ण है, यह सभी कारणों और प्रभावों आदि में उपयोगी है। जहाँ तक सभी प्रकट शास्त्रों का संबंध है, वह ब्रह्मा और नारद के विषयों पर स्कंद पुराण से उद्धरण देते हैं, जैसा कि यहाँ है:
संसार असमिन महा-घोर
जन्ममृत्यु-समकुल
पूजनं वासुदेवस्य
तारकं वादिभिः स्मृतम्
भौतिक संसार में, जो कि अंधकार और खतरों से भरा है, जन्म और मृत्यु के साथ-साथ विभिन्न चिंताओं से भरा है, महान उलझाव से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता प्रभु वासुदेव की प्रेमपूर्ण पारलौकिक भक्ति सेवा को स्वीकार करना है। यह सभी वर्गों के दार्शनिकों द्वारा स्वीकार किया जाता है।
श्रील जीव गोस्वामी ने एक और सामान्य मार्ग भी उद्धृत किया है, जो तीन पुराणों, अर्थात् पद्म पुराण, स्कंद पुराण और लिंग पुराण में पाया जाता है। यह इस प्रकार चलता है:
आलोड्य सर्व-शास्त्रानि
विचार्य च पुनः पुनः
इदम एकं सुनिष्पन्नं
ध्येयो नारायणः सदा
"सभी प्रकटित शास्त्रों की बार-बार जाँच-पड़ताल करने और उन्हें परखने के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भगवान नारायण परम निरपेक्ष सत्य हैं, और इस प्रकार केवल उनकी ही आराधना की जानी चाहिए।"
वही सत्य गरुड़ पुराण में अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार वर्णित भी किया गया है:
परम् गतोऽपि वेदानां
सर्वशास्त्रार्थवेद्यः अपि
यो न सर्वेश्वरे भक्तः
तम्विद्यात् पुरुषाधमम्
"यद्यपि कोई सभी वेदों के पार चला गया है, और भले ही कोई सभी प्रकटित शास्त्रों में पारंगत है, यदि वह सर्वोच्च भगवान का भक्त नहीं है, तो उसे मानव जाति में सबसे नीच माना जाना चाहिए।" इसी तरह, श्रीमद्-भागवतम (5.18.12) में भी अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार कहा गया है:
यस्यास्ति भक्तिः भगवत्याकिंचना
सर्वैर्गुणैस्तत्र समासतेसुराः
हरवभक्तस्य कुतो महद्गुणा:
मनोरथेनासतिधा वतोबहिः
जिसकी सर्वोच्च भगवान के प्रति अटूट भक्ति है, उसमें निश्चित रूप से देवताओं के सभी अच्छे गुण होने चाहिए, और इसके विपरीत जो भगवान का भक्त नहीं है, वह मानसिक अटकलों के अंधेरे में मँडराता रहता होगा और इस प्रकार भौतिक अस्थायीता में लगा रहता होगा। श्रीमद्-भागवतम (11.11.18) कहता है:
शब्द-ब्रह्मणि निष्णातो
न निष्णायतपरेयादि
श्रमस्तस्य श्रमफलो
ह्यधेनुमिवरक्षतः
"कोई व्यक्ति वैदिक ग्रंथों के सभी पारलौकिक साहित्य में पारंगत हो सकता है, लेकिन यदि वह परमेश्वर से परिचित होने में विफल रहता है, तो यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि उसकी सारी शिक्षा एक जानवर के बोझ की तरह है या दूध देने की क्षमता के बिना गाय रखने जैसा है।"
इसी तरह, भगवान को प्रेममय पारलौकिक सेवा देने की स्वतंत्रता सभी को प्राप्त है, यहाँ तक कि महिलाओं, शूद्रों, वन्य जनजातियों या पापपूर्ण परिस्थितियों में जन्मे किसी भी अन्य जीवित प्राणियों को भी।
तेवैविदंतिअतितरंतिचदेवमायाम्
स्त्रीशूद्रहूणशबरअपि पापजीवाः
यध् अभूतक्रामपरायणशीलशिक्षाः
तिर्यग्जना अपिकिमु श्रुतधारणाये
(भागवत 2.7.46)
मनुष्य में सबसे निम्न को भक्तिमय जीवन के उच्चतम स्तर तक ऊपर उठाया जा सकता है यदि उन्हें भगवान की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में पारंगत एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। यदि निम्नतम को इतना ऊंचा उठाया जा सकता है, तो उच्चतम के बारे में क्या कहना है, जो वैदिक ज्ञान में पारंगत हैं? निष्कर्ष यह है कि भगवान के प्रति भक्तिमय सेवा सभी के लिए खुली है, चाहे वे कोई भी हों। सेवा के सभी प्रकार के प्रदर्शनकर्ताओं के लिए इसके आवेदन की पुष्टि है।
इसलिए वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के प्रशिक्षण के माध्यम से पूर्ण ज्ञान के साथ भगवान की भक्तिमय सेवा सभी के लिए अनुशंसित है, भले ही कोई मनुष्य न हो। इसकी पुष्टि गरुड़ पुराण में इस प्रकार की गई है:
कीटपक्षिम्रगाणां च
हरौसन्न्यस्तचेतसाम्
ऊर्ध्वमेव गतिंमन्ये
किंपुनर्ज्ञानिनांनृणाम्
"यदि कीड़े, पक्षी और जानवर भगवान की पारलौकिक प्रेममय सेवा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं, तो उन्हें उच्चतम पूर्ण जीवन में ऊपर उठाने का आश्वासन दिया जाता है, तो मानव जाति के बीच के दार्शनिकों के बारे में क्या कहना है?"
इसलिए भगवान के प्रति भक्तिमय सेवा करने के लिए उचित रूप से योग्य उम्मीदवारों की तलाश करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे या तो अच्छे व्यवहार वाले हों या प्रशिक्षित न हों, वे या तो विद्वान हों या मूर्ख, वे या तो स्थूल रूप से आसक्त हों या जीवन के त्यागी क्रम में हों, वे मुक्त आत्मा हों या मोक्ष के इच्छुक हों, वे भक्तिमय सेवा के निर्वहन में अनभिज्ञ हों या उसी में निपुण हों - इन सभी को उचित मार्गदर्शन में भक्तिमय सेवा करने से सर्वोच्च पद पर ऊपर उठाया जा सकता है। भगवद् गीता (9.30, 32) में भी इसकी पुष्टि इस प्रकार की गई है:
अपित्चेत्सदुराचारो
भजतेमामनन्यभाक्
साधुर्एवसमनव्याः
सम्यङववस्थितोहिः
माँहि पार्वतव्यपाश्रित्य
येऽपि स्युपापयोनयः
स्त्रियोवैश्यास्तथाशुद्राः
तेऽपि यांतिपरमंगतिम्
भले ही यदि कोई व्यक्ति सभी प्रकार के अधर्मपूर्ण कार्यों में पूरी तरह लिप्त हो, यदि वह भाग्यवश उचित मार्गदर्शन में प्रभु की प्रेममयी पराविद्या सेवा में संलग्न हो जाता है, तो उसे निस्संदेह सबसे परिपूर्ण पवित्र व्यक्ति मानना चाहिए। और इसलिए कोई भी व्यक्ति, चाहे जो भी हो और चाहे वह कोई भी हो - यहाँ तक कि पतित महिला, कम बुद्धिमान श्रमिक, धीमे व्यापारी या इन सबसे भी निम्न पुरुष - भगवान के पास, अपने घर वापस जाकर जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता है, बशर्ते वह पूरी श्रद्धा के साथ प्रभु के चरण कमलों का आश्रय ले। यह हार्दिक श्रद्धा ही एकमात्र योग्यता है जो किसी को जीवन के सर्वोच्च पूर्णता के स्तर तक ले जा सकती है, और जब तक और जब तक ऐसी वास्तविक श्रद्धा नहीं जगाई जाती, तब तक भौतिक अनुमान में स्वच्छता या अशुद्धता, शिक्षा या अशिक्षा में अंतर होता है। आग हमेशा आग ही होती है, और इसलिए यदि कोई आग को छूता है, जानबूझकर या अनजाने में, तो आग बिना किसी भेद के अपने तरीके से कार्य करेगी। सिद्धांत है: हरि हरति पापानी दुष्ट-चित्तैर अपि स्मृतः। सर्वशक्तिमान प्रभु भक्त को सभी पाप प्रतिक्रियाओं से शुद्ध कर सकते हैं, जैसे सूर्य अपनी शक्तिशाली किरणों से सभी प्रकार के संक्रमणों को जीवाणुरहित कर सकता है। "भौतिक भोग के प्रति आकर्षण प्रभु के शुद्ध भक्त पर कार्य नहीं कर सकता है।" प्रकट धर्मग्रंथों में सैकड़ों और हजारों सूत्र हैं। आत्मारामाश्च मुनयः: "यहाँ तक कि आत्म-साक्षात्कार प्राप्त आत्माएँ भी प्रभु की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा से आकर्षित होती हैं।" केचित केवलया भक्त्या वासुदेव-परयाणाः: "मात्र सुनने और जप करने से ही व्यक्ति भगवान वासुदेव का महाभक्त बन जाता है।" न चलति भगवत्-पदावरिन्दाल लवनिमीषार्धम् अपि स वैष्णवाग्र्यः: "एक व्यक्ति जो एक पल या एक सेकंड के लिए भी प्रभु के चरण कमलों से नहीं हटता है, उसे सभी वैष्णवों में सबसे महान माना जाना चाहिए।" भगवत्-पार्षदताँ प्राप्ते मत्-सेवाया प्रतितां ते: "शुद्ध भक्त भगवान के व्यक्तित्व के साथ जुड़ना प्राप्त करने के बारे में आश्वस्त होते हैं, और इसलिए वे हमेशा प्रभु की पारलौकिक प्रेमपूर्ण सेवा में लगे रहते हैं।" इसलिए सभी महाद्वीपों में, सभी ग्रहों पर, सभी ब्रह्मांडों में, प्रभु की भक्ति सेवा, या भक्ति-योग प्रचलित है, और यही श्रीमद्-भागवतम और संबद्ध धर्मग्रंथों का कथन है। "सर्वत्र" का अर्थ प्रभु की सृष्टि के हर हिस्से में है। सभी इंद्रियों या केवल मन से भी प्रभु की सेवा की जा सकती है। दक्षिण भारतीय ब्राह्मण ने भी प्रभु की सेवा अपने मन की शक्ति पर ही की और वास्तव में प्रभु को साक्षात्कार किया। उस भक्त की सफलता निश्चित है जो भक्ति सेवा के तरीके में अपनी किसी भी एक इंद्रिय का पूर्ण रूप से उपयोग करता है। किसी भी घटक, यहाँ तक कि सबसे आम वस्तु - एक फूल, एक पत्ता, एक फल या थोड़ा पानी, जो ब्रह्मांड के किसी भी हिस्से में और बिना किसी कीमत के उपलब्ध हैं - से प्रभु की सेवा की जा सकती है और इस तरह सभी इकाइयों द्वारा ब्रह्मांडीय रूप से प्रभु की सेवा की जाती है। केवल सुनने मात्र से उनकी सेवा की जा सकती है, उनकी गतिविधियों को जपने या पढ़ने मात्र से भी उनकी सेवा की जा सकती है, केवल उनकी आराधना करने और उन्हें स्वीकार करने मात्र से भी उनकी सेवा की जा सकती है। भगवद् गीता में कहा गया है कि व्यक्ति अपने काम के परिणाम की पेशकश करके प्रभु की सेवा कर सकता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या करता है। आम तौर पर लोग कह सकते हैं कि वे जो कुछ भी कर रहे हैं वह ईश्वर से प्रेरित है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है। व्यक्ति को वास्तव में भगवान के सेवक के रूप में भगवान की ओर से काम करना चाहिए। भगवान भगवद् गीता (9.27) में कहते हैं:
यद् करोषि यद् अश्नासि
यज् जुहोषि ददासि यत्
यत् तपस्यसि कौन्तेय
तत् कुरुष्व मद-अर्पणम्
जो करें तो करो या जो तुम्हें करने में सुगम हो, जो खाओ तो खाओ, जो त्याग सकते हो तो त्याग करो, जो दान दे सकते हो तो दान दो और जो तप में करें तो करो, पर सब उसी के लिए करो । यदि व्यवसाय करते हो या किसी और पद पर कार्य करते हो तो भी भगवान् के लिए ही करो । जो भी खाओ उसे भगवान् को अर्पण करके खाओ, और निश्चिंत रहो कि उसे खा करके वह वैसा का वैसा लौटा देंगे । वह पूर्ण हैं, इसलिये जो कुछ भक्त के द्वारा अर्पण करके खाते हैं, उसे भक्त के प्रेम के कारण स्वीकार करते हैं, पर फिर उसे भक्त के लिए प्रसाद के रूप में लौटा देते हैं, जिससे भक्त उसे खाकर सुखी हो सके । दूसरे शब्दों में भगवान् के दास बनो और उस चेतना में शांतिपूर्वक रहो, अंततः घर लौटो, भगवान् के पास ।
स्कंद पुराण में कहा है :
यस्य स्म्र्त्या च नामोक्त्या
तपो-यज्ञ-क्रियादिषु
नूनं संपूर्णतामेति
सद्यो वंदे तमच्युतम्
" मैं उसे नमस्कार करता हूँ, जो अच्युत है, क्योंकि केवल उसे स्मरण करने से या उसके पवित्र नाम का उच्चारण करने से ही सभी तपों, यज्ञों या सकाम कर्मों की सिद्धि हो जाती है, और इस विधि का पालन सभी कर सकते हैं ।" कहा गया है ( भागवत 2.3.10) :
अकामः सर्व-कामो वा
मोक्ष-काम उदार-धीः
तीव्रेण भक्ति-योगेन
यजेत पुरुषं परम
यद्यपि कोई व्यक्ति पूर्ण कामनाओं से भरा हुआ हो या उसकी कोई इच्छा न हो, तो भी वह पूर्ण सिद्धि के लिए इस अचूक भक्ति-योग का पालन कर सकता है ।" प्रत्येक देव और देवी को प्रसन्न करने के लिए चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उन सभी की जड़ भगवान् हैं । जैसे वृक्ष की जड़ पर पानी डालकर सभी शाखाओं और पत्तियों की सेवा और संजीवन किया जाता है, उसी प्रकार परम भगवान् की सेवा करने से हम हर देव और देवी की स्वतः ही सेवा कर लेते हैं, इसके लिए अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं होती । भगवान् सर्वव्यापी हैं, और इसलिये उनकी सेवा भी सर्वव्यापी है । इस तथ्य की पुष्टि स्कंद पुराण में इस प्रकार से की गई है :
अर्चिते देव-देवेशे
शंख-चक्र-गदा-धरे
अर्चितः सर्व-देवाः स्युः
यत: सर्व-गतो हरिः
जब परम भगवान्, भगवान् का व्यक्तित्व, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल है, की पूजा की जाती है, तो निश्चित रूप से अन्य सभी देवों की भी स्वतः ही पूजा हो जाती है, क्योंकि भगवान् हरि, भगवान का व्यक्तित्व, सर्वव्यापी हैं । इसलिये, सभी मामलों में, जैसे कर्ताकारक, कर्मकारक, करणकारक, संप्रदानकारक या अपादानकारक, सभी को भगवान् की ऐसी प्रेममयी ट्रान्सेंडैंटल सेवा का लाभ मिलता है। जो व्यक्ति भगवान् की पूजा करता है, भगवान् स्वयं जिनकी पूजा की जाती है, जिस कारण से भगवान् की पूजा की जाती है, पूजा की सामग्री, वह स्थान जहाँ ऐसी पूजा की जाती है, आदि - हर किसी को ऐसे कर्म का लाभ मिलता है ।
भौतिक संसार के विनाश के दौरान भी, भक्ति-योग की प्रक्रिया को लागू किया जा सकता है। कालेन नष्टा प्रलय वाणीयं : भगवान् का विनाश के समय पूजन किया जाता है क्योंकि वे वेदों को विनाश से बचाते हैं। हर युग या कल्प में उनकी पूजा की जाती है। जैसा कि श्रीमद-भागवतम् (12.3.52) में कहा गया है :
कृते यद् ध्यानतो विष्णुं
त्रेतायां यजतो मखैः
द्वापरे परिचार्यायां
कलौ तद् धरि-कीर्तनात्
विष्णु पुराण में लिखा है:
स हानिस्तन् महच्छिद्रं
स मोहः स च विभ्रमः
यन्-मुहूर्तं क्षणं वापि
वासुदेवं न चिंतेयत्
"वासुदेव, जो कि भगवान श्रीहरि के सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, का यदि क्षण भर के लिए भी स्मरण छूट जाए तो वह सबसे बड़ा नुकसान है, सबसे बड़ा भ्रम है और सबसे बड़ी विसंगति है।" भगवान की पूजा जीवन के सभी पड़ावों में की जा सकती है। उदाहरण के लिए, अपनी माता के गर्भ में ही महाराज प्रह्लाद और महाराज परीक्षित ने भगवान की पूजा की थी; बचपन में मात्र पाँच वर्ष की आयु में ध्रुव महाराज ने भगवान की पूजा की थी; युवावस्था में महाराज अम्बरीष ने भगवान की पूजा की थी और वृद्धावस्था की निराशा में भी महाराज धृतराष्ट्र ने भगवान की पूजा की थी। अजामिल ने मृत्यु के समय भी भगवान की पूजा की थी और चित्रकेतु ने स्वर्ग और नरक में भी भगवान की पूजा की थी। नरसिंह पुराण में कहा गया है कि जैसे ही नरक के निवासी भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण करने लगे, वे नरक से स्वर्ग की ओर ऊपर उठने लगे। दुर्वासा मुनि ने भी इस दृष्टिकोण का समर्थन किया है: मुच्यते यन्नाम्युदिते नारकोऽपि। "केवल भगवान के पवित्र नाम का उच्चारण करने से नरक के निवासी अपनी नारकीय पीड़ा से मुक्त हो गए।" इसलिए, श्रीमद-भागवतम का निष्कर्ष, जैसा कि शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को दिया था, यह है:
एतन निविद्यमानानाम्
इच्छतामकुतो भयम
योगिनां नृप निर्णीतम्
हरेर नामानुकीर्तनम्
"हे राजन, यह अंततः तय किया गया है कि जीवन के सभी वर्णों अर्थात् सन्यासी, योगी और सांसारिक कामनाओं का भोग करने वाले, को अपने वांछित लक्ष्यों की पूर्ति के लिए निडरता से भगवान का पवित्र नाम जपना चाहिए।" (भागवत 2.1.11)
इसी तरह, विभिन्न दिव्य धर्मग्रंथों में अप्रत्यक्ष रूप से संकेत दिया गया है:
1. भले ही कोई सभी वेदों और धर्मग्रंथों में पारंगत हो, यदि वह भगवान श्रीहरि का भक्त नहीं है, तो उसे मानव जाति में सबसे नीच माना जाता है।
2. गरुड़ पुराण, बृहन्नाद्रदीय पुराण और पद्म पुराण में यही बात दोहराई गई है: भगवान की भक्ति से रहित व्यक्ति को वैदिक ज्ञान और तपस्या का क्या उपयोग?
3. हजारों प्रजापतियों की तुलना भगवान के एक भक्त से कैसे की जा सकती है?
4. शुकदेव गोस्वामी ने कहा (भागवत 2.4.17) कि न तो तपस्वी, न ही वह जो अत्यधिक दानी है, न ही वह जो प्रसिद्ध है, न ही महान दार्शनिक, न ही महान गुह्यविद्याविज्ञ, और न ही कोई अन्य भगवान की सेवा में लगे बिना वांछित परिणाम प्राप्त कर सकता है।
5. यदि कोई स्थान स्वर्ग से भी अधिक गौरवशाली है, यदि उसमें वैकुण्ठ के भगवान या उनके शुद्ध भक्त की महिमा नहीं है, तो उसे तुरंत छोड़ देना चाहिए।
6. शुद्ध भक्त भगवान की सेवा में लगे रहने के लिए सभी पाँच प्रकार की मुक्ति को स्वीकार करने से इनकार कर देता है।
इसलिए, अंतिम निष्कर्ष यह है कि भगवान की महिमा का हमेशा और हर जगह प्रचार किया जाना चाहिए। उनकी महिमा के बारे में सुनना चाहिए, उनकी महिमा के बारे में जप करना चाहिए, और उनकी महिमा को हमेशा याद रखना चाहिए क्योंकि वह जीवन का सर्वोच्च पूर्णता का चरण है। जहां तक सांसारिक कर्मों का संबंध है, वे एक सुखद शरीर तक सीमित हैं; जहां तक योग का संबंध है, यह रहस्यमय शक्ति की प्राप्ति तक सीमित है; जहां तक अनुभवजन्य दर्शन का संबंध है, यह पारलौकिक ज्ञान की प्राप्ति तक सीमित है; और जहां तक पारलौकिक ज्ञान का संबंध है, यह मोक्ष की प्राप्ति तक सीमित है। यहां तक कि अगर इन्हें अपनाया जाता है, तो विशेष प्रकार के कार्यों के निर्वहन में विसंगतियों की पूरी संभावना होती है। लेकिन भगवान की पारलौकिक भक्ति सेवा को अपनाने की कोई सीमा नहीं है, न ही पतन का भय है। भगवान की कृपा से यह प्रक्रिया अपने आप अंतिम चरण तक पहुँच जाती है। भक्ति सेवा के प्रारंभिक चरण में ज्ञान की स्पष्ट आवश्यकता होती है, लेकिन उच्च चरण में ऐसे ज्ञान की कोई आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए प्रगति का सबसे अच्छा और गारंटीड मार्ग भक्ति-योग, शुद्ध भक्ति सेवा में लगना है।
श्रीमद् भागवतम् के पूर्ववर्ती चार श्लोकों का सार कभी-कभी वैयक्तिकवादी लोगों द्वारा अपनी व्याख्या को सही ठहराने के लिए निचोड़ा जाता है, लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि पहले चार श्लोकों का वर्णन भगवान ने स्वयं किया था, इसलिए वैयक्तिकवादियों को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई मौका नहीं मिलता क्योंकि उन्हें भगवान के वैयक्तिक स्वरूप की कोई समझ नहीं है। इसलिए, वैयक्तिकवादी इनसे अपनी कोई भी व्याख्या निचोड़ सकते हैं, लेकिन ये व्याख्याएं उन्हें कभी स्वीकार नहीं होंगी जिन्हें ब्रह्मा से चली आ रही शिष्य-सम्प्रदाय ने शिक्षा दी है, जैसा कि निम्नलिखित श्लोकों में स्पष्ट किया जाएगा। इसके अलावा, श्रुति इस बात की पुष्टि करती है कि परम सत्य, भगवान कभी भी किसी ऐसे व्यक्ति के समक्ष प्रकट नहीं होते हैं जिसे अपने शैक्षणिक ज्ञान पर झूठा गर्व है। श्रुति मंत्र स्पष्ट रूप से कहता है (कठ उपनिषद 1.2.23) :
नैषा तर्केंण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठम्
नैयाँ विरतिर्यत्तत एव वाक्यं
नाति वा अग्र्यन्ये अभिधास्यात्तदेव
पूर्ण मामला भगवान ने स्वयं समझाया है, और जो व्यक्ति भगवान के व्यक्तिगत स्वरूप को नहीं समझ पाता, वह शिष्य-सम्प्रदाय के भागवतों से शिक्षा प्राप्त किए बिना शायद ही कभी श्रीमद भागवतम् के उद्देश्य को समझ पाता है।
