श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  2.9.35 
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।
प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मा, यह जान लो कि ब्रह्माण्ड के तमाम तत्व ब्रह्माण्ड में प्रवेश करते हुए भी प्रवेश नहीं करते। इसी प्रकार मैं स्वयं भी हर सृष्ट चीज में विद्यमान रहते हुए भी हर चीज से अलग रहता हूँ।
 
O Brahma, you should know that all the elements of the universe enter the universe but do not enter it. In the same way, even though I am situated in every created thing, I am also separate from every thing.
तात्पर्य
भौतिक सृष्टि के महान तत्व, जैसे पृथ्वी, पानी, आग, हवा और आकाश, सभी प्रकट प्राणियों के शरीर में प्रवेश करते हैं - समुद्र, पहाड़, जलीय, पौधे, सरीसृप, पक्षी, जानवर, मानव, देवता और हर कोई भौतिक रूप से प्रकट - और साथ ही ऐसे तत्व अलग-अलग रूप से स्थित हैं। चेतना की विकसित अवस्था में, मानव शारीरिक और भौतिक विज्ञान दोनों का अध्ययन कर सकता है, लेकिन ऐसे विज्ञानों के मूल सिद्धांत भौतिक तत्वों और कुछ नहीं हैं। मानव का शरीर और पहाड़ का शरीर, ब्रह्मा सहित देवताओं के शरीर भी, सभी समान सामग्री से बने हैं - पृथ्वी, जल, आदि - और साथ ही तत्व शरीर से परे हैं। पहले तत्वों का निर्माण किया गया था, और इसलिए वे बाद में शरीर के निर्माण में प्रवेश कर गए, लेकिन दोनों परिस्थितियों में वे ब्रह्मांड में प्रवेश कर गए और प्रवेश भी नहीं किया। इसी तरह, सर्वोच्च भगवान, अपनी विभिन्न ऊर्जाओं द्वारा, जैसे कि आंतरिक और बाहरी, प्रकट ब्रह्मांड में हर चीज के भीतर हैं, और साथ ही वह हर चीज से बाहर हैं, जैसा कि पहले वर्णित है, भगवान के राज्य (वैकुण्ठलोक) में स्थित है। यह ब्रह्म-संहिता (5.37) में बहुत अच्छी तरह से कहा गया है:

आनंद-चिन्मय-रस-प्रतिभावितभीर

ताभिर या एवा निजा-रूपतया कलाभिः

गोलोका एवा निवसत्य अखिलात्म-भूतः

गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

"मैं भगवान गोविंद की पूजा करता हूं, जो अपने अलौकिक अस्तित्व, ज्ञान और आनंद की आंतरिक शक्ति के विस्तार से, अपने स्वयं के और विस्तारित रूपों में आनंद लेते हैं। साथ ही वह सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में प्रवेश करता है।"

उनके पूर्ण अंगों का यह विस्तार भी उसी ब्रह्म-संहिता (5.35) में अधिक निश्चित रूप से समझाया गया है:

एकः अपि असौ रचितुं जगद-अंड-कोटिं

यच्-शक्तिः अस्ति जगद-अंड-चया यद्-अंतः

अंड-अंतर-स्थ-परमाणु-चया-अंतर-स्थं

गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

"मैं भगवान गोविंद की पूजा करता हूं, जो अपने एक पूर्ण भाग से, प्रत्येक ब्रह्मांड और परमाणुओं के प्रत्येक कण के अस्तित्व में प्रवेश करता है और इस प्रकार असीमित रूप से भौतिक सृष्टि में अपनी अनंत ऊर्जा को प्रकट करता है।"

अव्यक्तवादी कल्पना कर सकते हैं या यहाँ तक कि यह भी अनुभव कर सकते हैं कि सर्वोच्च ब्रह्म इस प्रकार सर्व-व्यापी है, और इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि उनके व्यक्तिगत रूप की कोई संभावना नहीं है। इसमें उनके अलौकिक ज्ञान का रहस्य निहित है। यह रहस्य भगवद् भक्ति से परे है, और जो ऐसे पारलौकिक प्रेम से भगवान के प्रेम से अभिभूत है, वह भगवान के व्यक्तित्व को प्रत्येक परमाणु और प्रत्येक चल या अचल वस्तु में बिना किसी कठिनाई के देख सकता है। और साथ ही वह भगवान के व्यक्तित्व को अपने निवास, गोलोक में, अपने शाश्वत सहयोगियों के साथ शाश्वत मनोरंजन का आनंद लेते हुए देख सकता है, जो उनके अलौकिक अस्तित्व के विस्तार भी हैं। यह दृष्टि आध्यात्मिक ज्ञान का वास्तविक रहस्य है, जैसा कि भगवान ने शुरुआत में कहा है (सहरस्यं तद-अंगं च)। यह रहस्य सर्वोच्च के ज्ञान का सबसे गोपनीय हिस्सा है, और मानसिक सट्टेबाजों के लिए बौद्धिक व्यायाम के बल पर खोज करना असंभव है। ब्रह्माजी द्वारा उनकी ब्रह्म-संहिता (5.38) में बताए गए प्रक्रिया के माध्यम से रहस्य का पता लगाया जा सकता है:

प्रेमानजन-चुरिता-भक्ति-विलोचनै

संतः सदैव हृदयेषु विलोकयंती

यं श्यामसुंदरम अचिंत्य-गुण-स्वरूपं

गोविंदम आदि-पुरुषं तम अहं भजामि

"मैं भगवान गोविंद, मूल व्यक्तित्व की पूजा करता हूं, जिसे शुद्ध भक्त, भगवान के प्रेम के मरहम से उनकी आंखों को मलते हुए, हमेशा अपने दिलों में देखते हैं। यह गोविंद, भगवान का मूल व्यक्तित्व, सभी पारलौकिक गुणों के साथ श्यामसुंदर है।"

इसलिए, यद्यपि वह प्रत्येक परमाणु में मौजूद हैं, फिर भी सर्वोच्च भगवद् व्यक्तित्व ईश्वर शुष्क सट्टेबाजों को दिखाई नहीं दे सकते हैं; फिर भी शुद्ध भक्तों की आँखों के सामने रहस्य खुल जाता है क्योंकि उनकी आँखें ईश्वर के प्रेम से अभिषेक करती हैं। और ईश्वर के इस प्रेम को केवल भगवान की अनुभवात्मक भक्तिपूर्ण सेवा की साधना से ही प्राप्त किया जा सकता है, और कुछ नहीं। भक्तों की दृष्टि साधारण नहीं है; यह भक्ति सेवा की प्रक्रिया द्वारा शुद्ध की जाती है। दूसरे शब्दों में, जैसे सार्वभौमिक तत्व भीतर और बाहर दोनों होते हैं, इसी तरह भगवान का नाम, रूप, गुण, लीला, परिचारक, आदि, जैसा कि प्रकट शास्त्रों में वर्णित है या वैकुण्ठलोक में किया जाता है, बहुत दूर, बहुत दूर भौतिक ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति से परे, वास्तव में भक्त के हृदय में प्रसारित हो रहा है। कम ज्ञान वाला व्यक्ति यह नहीं समझ सकता है, यद्यपि भौतिक विज्ञान के द्वारा कोई दूर की चीजों को टेलीविजन के माध्यम से देख सकता है। वास्तव में, आध्यात्मिक रूप से विकसित व्यक्ति ईश्वर के राज्य के टेलीविजन को हमेशा अपने हृदय में प्रतिबिंबित करने में सक्षम होता है। भगवद् व्यक्तित्व के ज्ञान का रहस्य यही है। भगवान किसी को भी और सभी को भौतिक अस्तित्व के बंधन (मुक्ति) से मुक्ति प्रदान कर सकते हैं, फिर भी वह शायद ही कभी ईश्वर के प्रेम का अधिकार प्रदान करते हैं, जैसा कि नारद ने पुष्टि की है (मुक्तिं दधाति करिचित् स्मा न भक्ति-योगम्)। भगवान की यह पारलौकिक भक्तिपूर्ण सेवा इतनी अद्भुत है कि यह व्यवसाय योग्य भक्त को हमेशा निरपेक्ष स्पर्श से विचलन के बिना, मनोवैज्ञानिक गतिविधियों में तल्लीन रखता है। इस प्रकार भक्त के हृदय में विकसित ईश्वर का प्रेम एक महान रहस्य है। ब्रह्माजी ने पहले नारद को बताया था कि ब्रह्माजी की इच्छाएँ कभी भी अधूरी नहीं रहती हैं क्योंकि वह हमेशा भगवान की पारलौकिक प्रेममय सेवा में लीन रहते हैं; और न ही उनके हृदय में भगवान की पारलौकिक सेवा को छोड़कर और कुछ भी इच्छा होती है। यही भक्ति-योग की प्रक्रिया की सुंदरता और रहस्य है। जैसे भगवान की इच्छा अचूक है क्योंकि वे अच्युत हैं, इसी तरह भक्तों की भगवान की पारलौकिक सेवा में इच्छाएँ भी अच्युत, अचूक हैं। हालाँकि, भक्ति सेवा के रहस्य के ज्ञान के बिना आम आदमी के लिए इसे समझना बहुत मुश्किल है, क्योंकि पारस पत्थर की शक्ति को जानना बहुत मुश्किल है। जैसे पारस पत्थर शायद ही कभी पाया जाता है, उसी तरह भगवान का एक शुद्ध भक्त भी शायद ही कभी देखा जाता है, यहाँ तक कि लाखों मुक्त आत्माओं (कोटिस्वपि महामुनि) के बीच भी। ज्ञान की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त की गई सभी प्रकार की पूर्णताओं में से, भक्तिपूर्ण सेवा में योग पूर्णता सभी में सबसे ऊंची और सबसे रहस्यमय भी है, योग प्रदर्शन की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त आठ प्रकार की रहस्यमय पूर्णताओं से भी अधिक रहस्यमय। भगवद्-गीता (18.64) में भगवान ने इसलिए अर्जुन को इस भक्ति-योग के बारे में सलाह दी:

सर्व-गुह्यतमं भूय

शृणु मे परमं वचः

"भगवद्-गीता के निर्देशों के सबसे गोपनीय भाग के बारे में मुझसे फिर से सुनो।" ब्रह्माजी द्वारा नारद को निम्नलिखित शब्दों में इसकी पुष्टि की गई थी:

इदं भागवतम नाम

यन मे भगवतोदितम्

संग्रहोयं विभूतीनां

त्वम् एतद् विपुलिकुरु

ब्रह्माजी ने नारद से कहा, "मैंने भगवतम के बारे में जो कुछ भी आपसे कहा है वह मुझे भगवद् व्यक्तित्व ईश्वर ने समझाया था, और मैं आपको सलाह देता हूं कि आप इन विषयों को अच्छी तरह से विस्तारित करें ताकि लोग भगवान की अनु

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)