श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  2.9.34 
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।
तद्विद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तम: ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मा, जो कुछ भी मूल्यवान प्रतीत होता है, यदि वह मुझसे संबंधित नहीं है, तो उसमें कोई सच्चाई नहीं है। इसे मेरी माया के रूप में जानो, यह उस प्रतिबिंब के समान है जो अंधेरे में दिखाई देता है।
 
O Brahma, whatever appears to be substantial, if it is not related to Me, it has no reality. Know it to be My Maya, know it to be an image that appears in the darkness.
तात्पर्य
पिछली पंक्ती में यह पहले से ही निर्धारित किया गया है कि ब्रह्मांडीय प्रकट के किसी भी चरण में - इसकी उपस्थिति, उसका निर्वाह, उसका विकास, विभिन्न ऊर्जाओं का परस्पर मेल, उसकी गिरावट और उसका विलोप - सभी का मूलभूत संबंध भगवान के व्यक्तित्व से है। और जैसे कि, जब भी भगवान के साथ इस प्रधान संबंध को भूला दिया जाता है, और जब भी चीजों को भगवान से संबंधित किये बिना वास्तविक रूप में स्वीकार कर लिया जाता है, उस कल्पना को भगवान की मायावी ऊर्जा का उत्पाद कहा जाता है। क्योंकि कुछ भी भगवान के बिना नहीं रह सकता, यह जाना जाना चाहिए कि मायावी ऊर्जा भी भगवान की ऊर्जा है। सब कुछ भगवान के साथ संबंध में जोड़ने के सही निष्कर्ष को योग-माया या मिलन की ऊर्जा कहा जाता है, और किसी चीज को भगवान के साथ उसके संबंध से अलग करने की गलत अवधारणा को भगवान की दैवी माया, या महा-माया कहा जाता है। दोनों मायाओं का भी भगवान के साथ संबंध है क्योंकि उनके संबंधित बिना कुछ भी नहीं रह सकता है। जैसे कि, भगवान से रिश्ते को अलग करने की गलत अवधारणा झूठी नहीं, बल्कि मायावी है। एक चीज को दूसरी चीज मानना भ्रम कहलाता है। उदाहरण के लिए, रस्सी को साँप समझना भ्रम है, लेकिन रस्सी झूठी नहीं है। भ्रमित व्यक्ति के सामने जैसी रस्सी है, वह बिल्कुल भी झूठी नहीं है, लेकिन स्वीकृति भ्रामक है। इसलिए भगवान की ऊर्जा से अलग होने वाली इस भौतिक अभिव्यक्ति को स्वीकार करने की गलत अवधारणा भ्रम है, लेकिन यह झूठी नहीं है। और इस भ्रामक अवधारणा को अज्ञान के अंधकार में वास्तविकता का प्रतिबिंब कहा जाता है। कुछ भी जो स्पष्ट रूप से "मेरी ऊर्जा से उत्पन्न नहीं" होने के रूप में प्रकट होता है, उसे माया कहा जाता है। यह अवधारणा कि जीवित इकाई निराकार है या सर्वोच्च भगवान निराकार है, वह भी भ्रम ही है। भगवद-गीता (2.12) में भगवान ने युद्ध के मैदान के बीच में कहा था कि अर्जुन के सामने खड़े योद्धा, स्वयं अर्जुन और यहां तक कि भगवान सभी पहले भी अस्तित्व में थे, वे कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में मौजूद थे, और वर्तमान शरीर के विनाश के बाद और भौतिक अस्तित्व से मुक्त होने के बाद भी वे भविष्य में भी व्यक्तिगत व्यक्तित्व बने रहेंगे। सभी परिस्थितियों में, भगवान और जीवित इकाइयाँ व्यक्तिगत व्यक्तित्व हैं, और भगवान और जीवित प्राणियों दोनों के व्यक्तिगत गुणों को कभी भी समाप्त नहीं किया जाता है; केवल मायावी ऊर्जा का प्रभाव, अंधेरे में प्रकाश का प्रतिबिंब, भगवान की दया से, हटाया जा सकता है। भौतिक दुनिया में, सूर्य का प्रकाश भी स्वतंत्र नहीं है, न ही चंद्रमा का प्रकाश है। प्रकाश का वास्तविक स्रोत ब्रम्हज्योति है, जो भगवान के दिव्य शरीर से प्रकाश का प्रसार करता है, और वही प्रकाश प्रकाश की किस्मों में परिलक्षित होता है: सूर्य का प्रकाश, चंद्रमा का प्रकाश, अग्नि का प्रकाश या बिजली का प्रकाश। तो सर्वोच्च आत्मा, भगवान से असंबद्ध होने के रूप में आत्मा की पहचान भी भ्रम है, और झूठा दावा "मैं सर्वोच्च हूँ" माया की आखिरी भ्रामक जाल या भगवान की बाहरी ऊर्जा है। शुरुआत में ही वेदांत-सूत्र में पुष्टि की जाती है कि सब कुछ सर्वोच्च से पैदा होता है, और इस प्रकार, जैसा कि पिछली पंक्ति में बताया गया है, सभी व्यक्तिगत जीवित इकाइयाँ सर्वोच्च जीवित प्राणी की ऊर्जा से पैदा होती हैं, भगवान के व्यक्तित्व। ब्रह्मा स्वयं भगवान की ऊर्जा से पैदा हुए थे, और सभी अन्य जीवित इकाइयाँ ब्रह्मा की एजेंसी के माध्यम से भगवान की ऊर्जा से पैदा हुई हैं; उनमें से किसी का भी सर्वोच्च भगवान से सहमत हुए बिना कोई अस्तित्व नहीं है। व्यक्तिगत जीवित इकाई की स्वतंत्रता वास्तविक स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि सर्वोच्च ईश्वर, भगवान में मौजूद वास्तविक स्वतंत्रता का प्रतिबिंब मात्र है। सशर्त आत्माओं द्वारा सर्वोच्च स्वतंत्रता का झूठा दावा भ्रम है, और इस निष्कर्ष को इस पंक्ति में स्वीकार किया गया है।

ज्ञान की कमी वाले लोग भ्रमित हो जाते हैं, और इसलिए तथाकथित वैज्ञानिक, शरीरविज्ञानी, अनुभववादी दार्शनिक आदि सूर्य, चंद्रमा, बिजली आदि के चकाचौंध भरे प्रतिबिंब से चकाचौंध हो जाते हैं और सर्वोच्च प्रभु के अस्तित्व को नकार देते हैं, और हर भौतिक चीज़ के निर्माण, रखरखाव और विनाश के बारे में सिद्धांतों और विभिन्न अनुमानों को आगे बढ़ाते हैं। चिकित्सा व्यवसायी किसी व्यक्ति व्यक्ति के शारीरिक शारीरिक निर्माण में आत्मा के अस्तित्व को नकार सकता है, लेकिन वह एक मृत शरीर को जीवन नहीं दे सकता है, भले ही मृत्यु के बाद भी शरीर के सभी तंत्र मौजूद हों। मनोवैज्ञानिक मस्तिष्क की शारीरिक स्थितियों का गंभीर अध्ययन करता है, जैसे कि मस्तिष्क की गांठ का निर्माण कार्यशील मन की मशीन हो, लेकिन मृत शरीर में मनोवैज्ञानिक मन के कार्य को वापस नहीं ला सकता है। सर्वोच्च प्रभु से स्वतंत्र ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति या शारीरिक निर्माण के ये वैज्ञानिक अध्ययन केवल विभिन्न प्रतिबिंबित बौद्धिक अभ्यास हैं, लेकिन अंत में वे सभी भ्रम हैं और कुछ नहीं। भौतिक सभ्यता के वर्तमान संदर्भ में विज्ञान और ज्ञान की ऐसी सभी उन्नति भ्रामक ऊर्जा के आवरण प्रभाव की एक क्रिया है। भ्रामक ऊर्जा के अस्तित्व के दो चरण होते हैं, अर्थात् आवरण प्रभाव और फेंकने वाला प्रभाव। फेंकने वाले प्रभाव से भ्रामक ऊर्जा जीवित संस्थाओं को अज्ञानता के अंधेरे में फेंक देती है, और आवरण प्रभाव से वह उन पुरुषों की आँखों को ढँक देती है जिनके पास सर्वोच्च व्यक्ति के अस्तित्व के बारे में ज्ञान की बहुत कम जानकारी है, जिन्होंने सर्वोच्च व्यक्तिगत जीव, ब्रह्मा को प्रबुद्ध किया था। सर्वोच्च प्रभु के साथ ब्रह्मा की पहचान का दावा कभी भी यहाँ नहीं किया गया है, और इसलिए ज्ञान के एक गरीब आधार वाले आदमी द्वारा इस तरह का मूर्खतापूर्ण दावा प्रभु की भ्रामक ऊर्जा का एक और प्रदर्शन है। भगवद-गीता (16.18-20) में भगवान कहते हैं कि राक्षसी व्यक्ति जो भगवान के अस्तित्व से इनकार करते हैं, उन्हें अज्ञानता के अंधकार में अधिक से अधिक फेंक दिया जाता है, और इस प्रकार ऐसे राक्षसी व्यक्ति ईश्वर के परम व्यक्तित्व के किसी भी ज्ञान के बिना जीवन के बाद जीवन में बदल जाते हैं। हालाँकि, समझदार व्यक्ति ब्रह्माजी से शिष्य उत्तराधिकार में प्रबुद्ध होता है, जिसे स्वयं भगवान द्वारा निर्देश दिया गया था, या अर्जुन से शिष्य उत्तराधिकार में, जिसे स्वयं भगवान द्वारा भगवद-गीता में निर्देश दिया गया था। वह भगवान के इस कथन को स्वीकार करता है:

अहं सर्वस्य प्रभवो

मत्तः सर्वं प्रवर्तते

इति मत्वा भजन्ते मां

बुधा भाव-समन्विताः

(Bg. 10.8)

भगवान सभी अभिव्यक्तियों का मूल स्रोत हैं, और जो कुछ भी बनाया, बनाए रखा और नष्ट किया गया वह भगवान की ऊर्जा से मौजूद है। यह जानने वाला समझदार व्यक्ति वास्तव में विद्वान है, और इसलिए वह भगवान का शुद्ध भक्त बन जाता है, जो भगवान की पारलौकिक प्रेममय सेवा में लगा हुआ है। हालाँकि भगवान की परावर्तक ऊर्जा ज्ञान की कमी वाले लोगों की आँखों के सामने विभिन्न भ्रम प्रदर्शित करती है, लेकिन समझदार व्यक्ति स्पष्ट रूप से जानता है कि भगवान अपनी विभिन्न ऊर्जाओं द्वारा हमारी दृष्टि से बहुत दूर से भी कार्रवाई कर सकते हैं, जैसे आग गर्मी और प्रकाश फैला सकती है। एक दूरस्थ स्थान से। प्राचीन ऋषियों के चिकित्सा विज्ञान में, जिसे आयुर्वेद के रूप में जाना जाता है, निम्नलिखित शब्दों में भगवान की सर्वोच्चता की निश्चित स्वीकृति है:

जगद-योनर अनिच्छस्य

चित्-आनंदैका-रूपिणः

पुंसोऽस्ति प्रकृतिर्नित्या

प्रतिच्छायेव भास्वतः

अचेतनापि चैतन्य-

योगेन परमात्मनः

अकरोद विश्वमखिलम्

अनित्यं नाटक-आकृतीम्

एक परम पुरुष है जो इस ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति का पूर्वज है और जिसकी ऊर्जा प्रकृति या मूर्त प्रकृति के रूप में कार्य करती है, जो प्रतिबिंब की तरह धुंधली है। प्रकृति की ऐसी भ्रामक कार्रवाई द्वारा, मृत पदार्थ को भी भगवान की जीवित ऊर्जा के सहयोग से स्थानांतरित करने के लिए प्रेरित किया जाता है, और भौतिक दुनिया अज्ञानी आंखों को एक नाटकीय प्रदर्शन की तरह दिखाई देती है। इसलिए, अज्ञानी व्यक्ति प्रकृति के नाटक में एक वैज्ञानिक या शरीर विज्ञानी भी हो सकता है, जबकि समझदार व्यक्ति प्रकृति को भगवान की भ्रामक ऊर्जा के रूप में जानता है। इस तरह के निष्कर्ष से, जैसा कि भगवद-गीता द्वारा पुष्टि की गई है, यह स्पष्ट है कि जीवित संस्थाएँ भी भगवान की श्रेष्ठ ऊर्जा (परा प्रकृति) का प्रदर्शन हैं, जैसे भौतिक दुनिया भगवान की निम्न ऊर्जा (अपरा प्रकृति) का प्रदर्शन है। भगवान की श्रेष्ठ ऊर्जा भगवान के समान अच्छी नहीं हो सकती, हालाँकि ऊर्जा और ऊर्जा के स्वामी या अग्नि और ऊष्मा में बहुत कम अंतर होता है। अग्नि में ऊष्मा होती है, लेकिन ऊष्मा अग्नि नहीं है। यह सरल बात उस व्यक्ति द्वारा नहीं समझी जाती है जिसके पास ज्ञान का भंडार है जो झूठे तौर पर दावा करता है कि अग्नि और ऊष्मा एक ही हैं। अग्नि की यह ऊर्जा (जैसे कि ऊष्मा) को यहाँ परावर्तन के रूप में समझाया गया है, न कि सीधे अग्नि। इसलिए जीवित संस्थाओं द्वारा प्रदर्शित जीवित ऊर्जा भगवान का प्रतिबिंब है, स्वयं भगवान कभी नहीं। भगवान का प्रतिबिंब होने के नाते, जीवित संस्था का अस्तित्व परम भगवान पर निर्भर है, जो मूल प्रकाश है। इस भौतिक ऊर्जा की तुलना अंधेरे से की जा सकती है, क्योंकि यह वास्तव में अंधेरा है, और अंधेरे में जीवित संस्थाओं की गतिविधियाँ मूल प्रकाश का प्रतिबिंब हैं। भगवान को इस श्लोक के संदर्भ से समझा जाना चाहिए। भगवान की दोनों ऊर्जाओं की गैर-निर्भरता को माया या भ्रम के रूप में समझाया गया है। कोई भी केवल प्रकाश के परावर्तन से अज्ञानता के अंधेरे का समाधान नहीं कर सकता है। इसी तरह, कोई भी साधारण व्यक्ति की परावर्तित रोशनी से भौतिक अस्तित्व से बाहर नहीं आ सकता; किसी को मूल प्रकाश से ही प्रकाश प्राप्त करना होता है। अंधेरे में सूर्य के प्रकाश का प्रतिबिंब अंधेरे को बाहर निकालने में असमर्थ है, लेकिन प्रतिबिंब के बाहर सूर्य का प्रकाश अंधेरे को पूरी तरह से बाहर निकाल सकता है। अँधेरे में कोई भी कमरे में चीजें नहीं देख सकता। इसलिए अंधेरे में व्यक्ति को सांपों और बिच्छुओं से डर लगता है, हालाँकि ऐसी चीजें नहीं भी हो सकती हैं। लेकिन रोशनी में कमरे की चीजें साफ देखी जा सकती हैं और सांपों और बिच्छुओं का डर तुरंत दूर हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को भगवान के प्रकाश का आश्रय लेना होगा, जैसा कि भगवद-गीता या श्रीमद्-भागवतम में है, न कि उन चिंतनशील व्यक्तित्वों का जो भगवान के साथ स्पर्श नहीं रखते हैं। किसी को भी ऐसे व्यक्ति से भगवद्-गीता या श्रीमद्-भागवतम नहीं सुनना चाहिए जो भगवान के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता है। ऐसा व्यक्ति पहले से ही बर्बाद हो चुका होता है, और ऐसे बर्बाद व्यक्ति के साथ कोई भी संबंध जुड़ने वाले को भी बर्बाद कर देता है।

पद्म पुराण के अनुसार, भौतिक परिधि के भीतर असंख्य भौतिक ब्रह्मांड हैं, और वे सभी अंधकार से भरे हुए हैं। ब्रह्मा से लेकर (असंख्य ब्रह्माण्डों में असंख्य ब्रह्मा मौजूद हैं) तुच्छ चींटी तक, कोई भी जीव अंधेरे में जन्म लेता है, और उन्हें भगवान को प्रत्यक्ष रूप से देखने के लिए भगवान के वास्तविक प्रकाश की आवश्यकता होती है, जैसे कि सूर्य को केवल सूर्य के प्रत्यक्ष प्रकाश द्वारा ही देखा जा सकता है। कोई भी दीपक या मानव निर्मित टॉर्चलाइट, चाहे वह कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सूर्य को देखने में मदद नहीं कर सकता। सूर्य स्वयं को प्रकट करता है। इसलिए भगवान की विभिन्न ऊर्जाओं की क्रिया या स्वयं भगवान के व्यक्तित्व को भगवान की अकारण दया द्वारा प्रकट प्रकाश से महसूस किया जा सकता है। अवैयक्तिकवादी कहते हैं कि ईश्वर को देखा नहीं जा सकता। भगवान को भगवान के प्रकाश से देखा जा सकता है, न कि मानव-निर्मित अटकलों से। यहां इस प्रकाश को विशेष रूप से विद्यात के रूप में उल्लेख किया गया है, जो कि भगवान द्वारा ब्रह्मा को दिया गया एक आदेश है। प्रभु का यह प्रत्यक्ष आदेश उनकी आंतरिक ऊर्जा का प्रकटीकरण है, और यह विशेष ऊर्जा भगवान को आमने-सामने देखने का साधन है। न केवल ब्रह्मा बल्कि भगवान द्वारा ऐसी दयालु प्रत्यक्ष आंतरिक ऊर्जा को देखने की कृपा पाने वाला कोई भी व्यक्ति बिना किसी मानसिक अटकल के भगवान के व्यक्तित्व को भी महसूस कर सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)