श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  2.9.33 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मा, तुम उस व्यक्तित्व का साक्षात्कार कर रहे हो, जो सृष्टि से पूर्व अस्तित्व में था जब केवल मैं ही था। उस समय भौतिक प्रकृति भी नहीं थी, जो सृष्टि का कारण है। जो अब तुम देख रहे हो, वह भी वही मैं हूँ और प्रलय के बाद जो बचेगा वह भी वही मैं ही हूँ।
 
O Brahma, I am the one who existed before the creation, when there was nothing except me. Then even the material nature which is the cause of this creation did not exist. What you are seeing now is also me and what will remain after the destruction is also me.
तात्पर्य
हमको अत्यंत सावधानीपूर्वक समझना चाहिए कि भगवान का व्यक्तित्व भगवान ब्रह्मा को संबोधित कर रहा है और स्वयं को बड़े जोरों से निर्दिष्ट कर रहा है, जो बताता है कि यह है, भगवान का व्यक्तित्व, जो सृष्टि से पहले विद्यमान था, केवल वही है जो सृष्टि का पालन करता है, और केवल वही है जो सृष्टि के विनाश के बाद भी बना रहता है। ब्रह्मा भी परम भगवान की ही एक रचना है। अद्वैतवादी इस अर्थों में एकता का सिद्धांत रखता है कि ब्रह्मा- जो "मैं" का भी समान सिद्धांत है, क्योंकि वह मैं से निकला है, परम सत्य है- भगवान के साथ एकरूप है, मैं का सिद्धांत है, और इस प्रकार मैं के सिद्धांत से अधिक कुछ नहीं है, जैसा कि इस श्लोक में समझाया गया है। अद्वैतवादी के तर्क को स्वीकार करते हुए, यह माना जाना चाहिए कि भगवान निर्माता मैं है और ब्रह्मा सृजित मैं है। इसलिए दो मैं के बीच एक अंतर है, अर्थात् प्रधान मैं और पराधीन मैं। इसलिए दो मैं अभी भी हैं, अद्वैतवादी के तर्क को स्वीकार करने पर भी। लेकिन हमको सावधानीपूर्वक समझना चाहिए कि इन दो मैं को वैदिक साहित्य (कठोपनिषद) में गुण के अर्थ में स्वीकार किया गया है। कठोपनिषद कहता है:

nityo nityānāṁ cetanaś cetanānām

eko bahūnāṁ yo vidadhāti kāmān

निर्माता मैं और सृजित मैं दोनों को वैद में गुणात्मक रूप से एक के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि वे दोनों नित्य और चेतन हैं। लेकिन एकवचन मैं निर्माता मैं है, और सृजित मैं बहुवचन संख्या में है क्योंकि ब्रह्मा और ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न कई मैं हैं। यह सरल सत्य है। पिता एक पुत्र को उत्पन्न करता है या जन्म देता है, और पुत्र भी कई अन्य पुत्रों को उत्पन्न करता है, और वे सभी मनुष्य के रूप में एक हो सकते हैं, लेकिन, एक ही समय में पिता से, पुत्र और पोते सभी अलग-अलग हैं। पुत्र पिता का स्थान नहीं ले सकता, न ही पोते। साथ ही पिता, पुत्र और पोता भी एक और अलग हैं। मनुष्य के रूप में वे एक हैं, लेकिन सापेक्ष रूप से वे अलग हैं। इसलिए निर्माता और सृजित या प्रधान और पराधीन की सापेक्षताओं को वेदों में यह कहकर विभेदित किया गया है कि प्रधान मैं पराधीन मैं का पोषक है, और इस प्रकार मैं के दो सिद्धांतों के बीच एक बड़ा अंतर है।

इस श्लोक की एक अन्य विशेषता में, कोई भी भगवान और ब्रह्मा दोनों के व्यक्तित्व का खंडन नहीं कर सकता है। इसलिए अंतिम परिणाम में नियंत्रक और नियंत्रित दोनों ही व्यक्ति हैं। यह निष्कर्ष अवैयक्तिकवादियों के उस निष्कर्ष का खंडन करता है कि अंतिम परिणाम में सब कुछ अवैयक्तिक है। कम बुद्धिमान अवैयक्तिकवादी स्कूल द्वारा बल दिए गए इस अवैयक्तिक तत्व का खंडन इस बात की ओर इशारा करके किया जाता है कि नियंत्रक मैं परम सत्य है और वह एक व्यक्ति है। नियंत्रित मैं, ब्रह्मा, भी एक व्यक्ति है, पर वह परम नहीं है। आध्यात्मिक मनोविज्ञान में स्वयं की प्राप्ति के लिए स्वयं को परम सत्य के समान सिद्धांत मान लेना सुविधाजनक हो सकता है, पर नियंत्रित और नियंत्रक के अंतर हमेशा रहता है जैसा कि इस श्लोक में स्पष्ट रूप से बताया गया है, जिसका अवैयक्तिकवादी घोर दुरुपयोग करते हैं। ब्रह्मा वास्तव में आमने-सामने अपने नियंत्रक भगवान को देख रहे हैं, जो अपनी दिव्य शाश्वत आकृति में विराजमान हैं, यहाँ तक कि भौतिक सृष्टि के विनाश के बाद भी। भगवान का स्वरूप, जैसा ब्रह्मा द्वारा देखा गया, ब्रह्मा की सृष्टि के पहले से विद्यमान था, और भौतिक सृष्टि के सभी अवयवों और कारकों के साथ भौतिक अभिव्यक्ति भी भगवान का ऊर्जा विस्तार है, और जब भगवान की ऊर्जा का प्रदर्शन समाप्त हो जाता है, तो जो बचता है वही ईश्वर का व्यक्तित्व है। इसलिए भगवान का स्वरूप सृष्टि, पालन और संहार की सभी परिस्थितियों में विद्यमान रहता है। वैदिक मंत्र इस तथ्य की पुष्टि इस कथन में करते हैं वासुदेवो वा इदम अग्र आसीन न ब्रह्मा न च शंकरा एको नारायण आसीन न ब्रह्मा नेशान, आदि। सृष्टि से पहले वासुदेव के अलावा कोई नहीं था। न ब्रह्मा थे और न शंकर। केवल नारायण थे और कोई नहीं, न ब्रह्मा और न ईशान। श्रीपाद शंकराचार्य ने भी भगवद्गीता पर अपनी टिप्पणियों में पुष्टि की है कि नारायण, या ईश्वर का व्यक्तित्व, सभी सृष्टि से परे है, लेकिन पूरी सृष्टि अव्यक्त का उत्पाद है। इसलिए सृष्ट और निर्माता के बीच अंतर हमेशा रहता है, हालाँकि निर्माता और सृष्ट दोनों ही एक जैसे गुणों वाले हैं। कथन की दूसरी विशेषता यह है कि परम सत्य भगवान है, या ईश्वर का व्यक्तित्व है। ईश्वर का व्यक्तित्व और उनके राज्य को पहले ही समझाया जा चुका है। ईश्वर का राज्य शून्य नहीं है जैसा कि अवैयक्तिकवादी मानते हैं। वैकुंठ ग्रह दिव्य विविधताओं से भरे हुए हैं, जिनमें उन ग्रहों के चार-हाथ वाले निवासी शामिल हैं, जिनके पास धन-समृद्धि और समृद्धि का खजाना है, और यहाँ तक कि उच्च श्रेणी के व्यक्तित्वों के लिए आवश्यक हवाई जहाज और अन्य सुविधाएँ भी हैं। इसलिए ईश्वर का व्यक्तित्व सृष्टि से पहले विद्यमान है, और वह वैकुंठलोक में सभी दिव्य विविधताओं के साथ विद्यमान है। वैकुंठ लोक, जिसे भगवद् गीता में भी सनातन प्रकृति का माना गया है, प्रकट ब्रह्मांड के नष्ट होने के बाद भी नष्ट नहीं होते हैं। वे पारलौकिक ग्रह पूरी तरह से एक अलग प्रकृति के हैं, और वह प्रकृति भौतिक सृष्टि, पालन या संहार के नियमों और विनियमों के अधीन नहीं है। ईश्वर के व्यक्तित्व का अस्तित्व वैकुंठलोक के अस्तित्व को दर्शाता है, जैसे कि किसी राजा के अस्तित्व का अर्थ है राज्य का अस्तित्व। श्रीमद्भागवत और अन्य प्रकट शास्त्रों में विभिन्न स्थानों पर ईश्वर के व्यक्तित्व का उल्लेख किया गया है। उदाहरण के लिए, श्रीमद्भागवत (2.8.10) में, महाराज परीक्षित पूछते हैं: स चापि यत्र पुरुषों विश्व-स्थित-उद्भव-अपयाय मुक्त्वात्मा-मायां मायाश शेटे सर्व-गुहासायः "ईश्वर का व्यक्तित्व, जो सृष्टि, पालन और संहार का कारण है, जो हमेशा भ्रामक ऊर्जा के प्रभाव से मुक्त रहता है और वही उसका नियंत्रक है, हर किसी के हृदय में कैसे निवास करता है?" विदुर का भी इसी तरह का एक प्रश्न है: तत्त्वानां भगवान् तेषां कतिधा प्रतिसंक्रमः तत्रेमं क उपासिरन क उ स्वित् अनुशेरते (भाग 3.7.37)

सतगुरु श्रीधर स्वामी ने अपने नोट्स में इसका अर्थ स्पष्ट किया है: "सृष्टि के निष्प्राण होने के समय नाग शेष पर लेटे हुए भगवान की कौन सेवा करता है?" इसका यह अर्थ है कि पारलौकिक भगवान अपने नाम, प्रसिद्धि, गुण और सामग्रियों के साथ सनातन रूप से विद्यमान हैं। इसका समर्थन स्कंद पुराण के काशी-खण्ड में ध्रुव-चरित के संबंध में भी किया गया है। वहाँ कहा गया है:

ना च्यवन्तेऽपि यद्-भक्ता

महत्यां प्रलयपदि

अतोऽच्युतोऽखिले लोके

स एकः सर्वगोऽव्ययः

सर्वव्यापी और अविनाशी ईश्वर भगवान अपने भक्तों के भी साथ प्रलय काल में नहीं नाश होते, ईश्वर के लिए तो यह बात और भी कैसे कही जा सकती है। ईश्वर भगवान सृष्टि की तीनों अवस्थाओं में सदा विद्यमान रहते हैं।

निर्गुणवादी परमेश्वर में कोई क्रिया नहीं मानते, लेकिन ब्रह्मा और परमेश्वर भगवान के बीच हुई इस चर्चा में भगवान के भी कार्य बताए गए हैं, क्योंकि उनका अपना रूप और गुण होता है। सृष्टि के पालन के दौरान ब्रह्मा और अन्य देवताओं का कार्य ईश्वर भगवान के कार्य समझने चाहिए। किसी राज्य का राजा या मुख्य कार्यकारी कार्यालय में काम करते हुए नज़र न आए, क्योंकि वे सुख-सुविधाओं में लिप्त हो सकते हैं। फिर भी आपको यह समझना चाहिए कि सब कुछ उन्हीं के निर्देशन में हो रहा है और सब कुछ उनकी आज्ञा से ही है। भगवान निराकार कभी नहीं होते। भले ही वे भौतिक संसार में मूर्ख श्रेणी के मनुष्यों को अपने निजी रूप में दिखाई न दें, इसलिए उन्हें कभी-कभी निराकार कहा जा सकता है। लेकिन वास्तव में वे वैकुण्ठ ग्रहों में और सृष्टि के अन्य ग्रहों में अपने शाश्वत रूप में हमेशा विभिन्न अवतारों के रूप में रहते हैं। इस संबंध में सूर्य का उदाहरण बहुत उपयुक्त है। रात में सूर्य अंधेरे में मनुष्य की आँखों को दिखाई नहीं देता, लेकिन सूर्य जहाँ भी उदय होता है वह दिखाई देता है। इसका मतलब यह नहीं है कि सूर्य निराकार होने के कारण पृथ्वी के किसी खास हिस्से के लोगों की आँखों को दिखाई नहीं देता है।

बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.1) में एक मंत्र है - आत्मैव इदम् अग्र आसीत् पुरुष-विधः। यह मंत्र पुरुष अवतार के प्रकट होने से पहले भी परमेश्वर भगवान (कृष्ण) का वर्णन करता है। भगवद-गीता (15.18) में कहा गया है कि भगवान कृष्ण पुरुषोत्तम हैं क्योंकि वे सर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं, जो पुरुषाक्षर और पुरुषक्षर से भी परे हैं। अक्षर-पुरुष या महा-विष्णु प्रकृति पर नज़र रखते हैं, लेकिन पुरुषोत्तम उससे भी पहले विद्यमान थे। इसलिए बृहदारण्यक उपनिषद भगवद-गीता के इस कथन की पुष्टि करता है कि भगवान कृष्ण ही परम व्यक्ति हैं (पुरुषोत्तम)।

कुछ वेदों में यह भी कहा गया है कि शुरुआत में केवल अव्यक्ति ब्राह्मण ही था। हालाँकि, इस श्लोक के अनुसार, अव्यक्ति ब्राह्मण, जो परम भगवान के शरीर की तेजोमय आभा है, उसे तात्कालिक कारण कहा जा सकता है, परन्तु सभी कारणों का कारण, या मूल कारण परमेश्वर व्यक्तित्व ही है। भगवान की अव्यक्ति विशेषता भौतिक दुनिया में विद्यमान है क्योंकि भौतिक इंद्रियों या भौतिक आँखों से भगवान को देखा या समझा नहीं जा सकता है। परमेश्वर को देखने या समझने की अपेक्षा करने से पहले व्यक्ति को अपनी इंद्रियों को आध्यात्मिक बनाना होगा। लेकिन वह हमेशा अपनी व्यक्तिगत क्षमता में लगे रहते हैं, और वह वैकुंठलोक के निवासियों को हमेशा आमने-सामने दिखाई देते हैं। इसलिए वह भौतिक रूप से अव्यक्ति हैं, जैसे राज्य का कार्यकारी प्रमुख सरकारी कार्यालयों में अव्यक्ति हो सकता है, हालांकि वह सरकारी भवन में अव्यक्ति नहीं है। इसी तरह, भगवान अपने निवास में अव्यक्ति नहीं हैं, जो कि हमेशा निरस्त-कुहकम होता है, जैसा कि भागवतम् की शुरुआत में ही कहा गया है। इसलिए भगवान की अव्यक्ति और व्यक्तिगत दोनों विशेषताएँ स्वीकार्य हैं, जैसा कि प्रकट शास्त्रों में उल्लेख किया गया है। ईश्वर के इस व्यक्तित्व को भगवद्-गीता में श्लोक ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम (गीता। 14.27) के संबंध में बहुत ही स्पष्ट रूप से समझाया गया है। इसलिए सभी तरह से आध्यात्मिक ज्ञान का गोपनीय भाग ईश्वर व्यक्तित्व का साक्षात्कार है, न कि उसकी अव्यक्त ब्राह्मण विशेषता का। इसलिए व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य अव्यक्त विशेषता में नहीं बल्कि परम सत्य की व्यक्तिगत विशेषता में होना चाहिए। घट के भीतर और घट के बाहर आकाश का उदाहरण छात्र के लिए परम सत्य की ब्रह्मांडीय चेतना की सर्वव्यापी गुणवत्ता के एहसास के लिए सहायक हो सकता है। किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि भगवान का व्यक्तिगत अंग और अंश झूठे दावे से सर्वोच्च बन जाता है। इसका केवल इतना मतलब है कि बाध्य आत्मा भ्रामक ऊर्जा का अंतिम जाल में शिकार है। भगवान की ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एक होने का दावा भ्रामक ऊर्जा, या दैवी माया द्वारा निर्धारित अंतिम जाल है। भगवान के अव्यक्त अस्तित्व में भी, जैसा कि भौतिक सृष्टि में है, व्यक्ति को भगवान के व्यक्तिगत साक्षात्कार की आकांक्षा करनी चाहिए, और यही पश्चाद अहं यद एतच्च योऽवाशिष्येत सोऽस्म्य aham का अर्थ है।

जब वह नारद को निर्देश दे रहे थे तब ब्रह्माजी ने भी यही सत्य स्वीकार किया था। उन्होंने कहा:

सोऽयम् तेऽभिहितस्तात

भगवान विश्व-भावनः

(भागवत 2.7.50)

सर्वोच्च ईश्वर, हरि के अतिरिक्त सभी कारणों का कोई अन्य कारण नहीं है। इसलिए यह श्लोक अहम् एव अन्य किसी भी चीज़ को कभी नहीं बताता है सिवाय परम भगवान के, और इसलिए व्यक्ति को ब्रह्म सम्प्रदाय के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, या ब्रह्माजी से नारद, व्यासदेव आदि तक के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, और सृजन के परम व्यक्तित्व, हरि या भगवान कृष्ण को महसूस करने के लिए जीवन में इसे एक बिंदु बनाना चाहिए। यह बहुत गोपनीय निर्देश भगवान के शुद्ध भक्तों को अर्जुन और सृष्टि की शुरुआत में ब्रह्मा को भी दिया गया था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, इंद्र, चंद्र और वरुण जैसे देवता निस्संदेह अलग-अलग कार्यों के निष्पादन के लिए भगवान के विभिन्न रूप हैं; भौतिक सृष्टि के विभिन्न मौलिक तत्व, साथ ही बहुआयामी ऊर्जाएँ भी उसी परमेश्वर व्यक्तित्व की हो सकती हैं, लेकिन उन सभी की जड़ परमेश्वर व्यक्तित्व, श्री कृष्ण है। शाखाओं और पत्तियों से विचलित होने के बजाय व्यक्ति को हर चीज़ की जड़ से जुड़ा होना चाहिए। यह इस श्लोक में दिया गया निर्देश है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)