श्रीभगवानुवाच
ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञानसमन्वितम् ।
सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३१ ॥
अनुवाद
भगवान ने फ़रमाया- शास्त्रों में वर्णित मुझसे जुड़े ज्ञान को अत्यंत गोपनीय माना गया है और इसे भक्ति सेवा के साथ ही हासिल किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के लिए ज़रूरी चीजों को मैं बता चुका हूँ। तुम इसे सावधानी से ग्रहण करो।
Sri Bhagavan said—The knowledge related to me described in the scriptures is extremely secret and can be obtained only through the combination of devotion. The material required for this method has been explained by me. You should accept it carefully.
तात्पर्य
ब्रह्मा भगवान के ब्रह्मांड के भीतर सबसे बड़े भक्त हैं, और इसलिए भगवान ने उनके चार प्रमुख प्रश्नों का उत्तर चार महत्वपूर्ण वाक्यों में दिया जिन्हें चार श्लोकों में मूल भागवत के रूप में जाना जाता है। ये ब्रह्मा के प्रश्न थे: (1) भगवान के रूप पदार्थ और पारलौकिक दोनों में क्या हैं? (2) भगवान की विभिन्न ऊर्जाएँ कैसे काम कर रही हैं? (3) भगवान अपनी विभिन्न ऊर्जाओं के साथ कैसे खेलते हैं? (4) ब्रह्मा को उन्हें सौंपे गए कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए कैसे निर्देशित किया जा सकता है? उत्तरों की प्रस्तावना यह चर्चा का श्लोक है, जिसमें भगवान ब्रह्मा को सूचित करते हैं कि उनके बारे में ज्ञान, सर्वोच्च निरपेक्ष सत्य, जैसा कि प्रकट शास्त्रों में कहा गया है, बहुत सूक्ष्म है और तब तक समझा नहीं जा सकता जब तक कि कोई भगवान की कृपा से आत्म-साक्षात्कारी न हो जाए। भगवान कहते हैं कि ब्रह्मा उत्तरों को समझा सकते हैं जैसा कि वे उन्हें समझाते हैं। इसका अर्थ यह है कि परम निरपेक्ष सत्ता का पारलौकिक ज्ञान तब जाना जा सकता है जब उसे स्वयं भगवान द्वारा ज्ञात किया जाए। महानतम सांसारिक विचारकों की मानसिक अटकलों से, परम सत्य को नहीं समझा जा सकता है। मानसिक सट्टेबाज अवैयक्तिक ब्रह्म साक्षात्कार के स्तर तक पहुँच सकते हैं, लेकिन वास्तव में, पारलौकिकता का पूर्ण ज्ञान अवैयक्तिक ब्रह्म के ज्ञान से परे है। इस प्रकार इसे सर्वोच्च गुप्त ज्ञान कहा जाता है। कई मुक्त आत्माओं में से कोई भगवान के व्यक्तित्व को जानने के योग्य हो सकता है। भगवद-गीता में भी स्वयं भगवान द्वारा कहा गया है कि लाखों लोगों में से कोई मानव जीवन में पूर्णता के लिए प्रयास कर सकता है, और कई मुक्त आत्माओं में से कोई उन्हें जान सकता है जैसे वह हैं। इसलिए, भगवान के व्यक्तित्व का ज्ञान केवल भक्ति सेवा द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। रहस्यम का अर्थ है भक्ति सेवा। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को भगवद-गीता में इसलिए निर्देश दिया क्योंकि उन्होंने पाया कि अर्जुन एक भक्त और मित्र है। ऐसी योग्यताओं के बिना, कोई भी भगवद-गीता के रहस्य में प्रवेश नहीं कर सकता है। इसलिए, कोई भी भगवान के व्यक्तित्व को तब तक नहीं समझ सकता जब तक कोई भक्त नहीं बन जाता और भक्ति सेवा का निर्वहन नहीं करता। यह रहस्य भगवान का प्रेम है। इसमें भगवान के व्यक्तित्व के रहस्य को जानने की मुख्य योग्यता है। और भगवान के पारलौकिक प्रेम के स्तर को प्राप्त करने के लिए, भक्ति सेवा के नियमित सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। नियमित सिद्धांतों को विधि-भक्ति कहा जाता है, या भगवान की भक्ति सेवा और इसका अभ्यास एक नौसिखिया अपनी वर्तमान इंद्रियों के साथ कर सकता है। इस तरह के नियमित सिद्धांत मुख्य रूप से भगवान की महिमा को सुनने और जप करने पर आधारित हैं। और भगवान की महिमा को सुनने और जप करने जैसे काम केवल भक्तों के साथ मिलकर ही संभव हो सकते हैं। इसलिए भगवान चैतन्य ने भगवान की भक्ति सेवा में पूर्णता प्राप्त करने के लिए पाँच मुख्य सिद्धांतों की सिफारिश की। पहला उपासकों से संगति (श्रवण) है; दूसरा भगवान की महिमा का गुणगान करना है; तीसरा, शुद्ध भक्त से श्रीमद-भागवत सुनना; चौथा, भगवान से जुड़े एक पवित्र स्थान में निवास करना; और पांचवा, भगवान की देवता की भक्ति के साथ पूजा करना। ऐसे नियम और विनियम भक्ति सेवा के अंग हैं। इसलिए, जैसा कि भगवान ब्रह्मा द्वारा अनुरोध किया गया है, भगवान अपने व्यक्तित्व के बारे में ब्रह्मा द्वारा पूछे गए चारों प्रश्न और अन्य भी बताएंगे जो उन्हीं प्रश्नों के अंग हैं और पार्सल हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥