यावत् सखा सख्युरिवेश ते कृत:
प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् ।
अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो
मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिन: ॥ ३० ॥
अनुवाद
हे अजन्मा प्रभु, आपने मेरे साथ ठीक वैसा ही हाथ मिलाया है, जैसे एक मित्र दूसरे मित्र से मिलाता है (मानो पद में समान हो)। अब मैं आपकी सेवा में लगा हूँगा और विभिन्न प्रकार के जीवों की सृष्टि करूँगा। मैं किसी भी तरह विचलित नहीं होऊँगा, पर मुझे गर्व नहीं होना चाहिए कि मैं ही परमेश्वर हूँ।
O unborn Lord, you have shaken hands with me in the same manner as a friend shakes hands with his friend (as if they are equals in status). Now I will engage in the creation of various living entities and continue to serve you. I will not be distracted in any way. But I pray that all this may not make me proud that I am the Supreme Lord.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा निश्चित रूप से भगवान के साथ मित्रता के भाव में स्थित हैं। प्रत्येक सजीव इकाई पांच विभिन्न पारलौकिक भावों में से किसी एक में भगवत् व्यक्तित्व के साथ शाश्वत रूप से संबंधित है, अर्थात् शांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। हम पहले ही भगवत् व्यक्तित्व के संबंध में इन पांच प्रकार के भावों पर चर्चा कर चुके हैं। यहां यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया गया है कि भगवान ब्रह्मा भगवत् व्यक्तित्व के साथ मित्रता के पारलौकिक भाव में संबंधित हैं। एक शुद्ध भक्त किसी भी पारलौकिक भाव में भगवान से संबंधित हो सकता है, यहां तक कि मातृत्व के भाव में भी, लेकिन भगवान का भक्त हमेशा एक पारलौकिक सेवक होता है। भगवान के समान या उससे बड़ा कोई नहीं है। यही भगवद गीता का सिद्धांत है। ब्रह्माजी, यद्यपि शाश्वत रूप से भगवान से मित्रता के पारलौकिक भाव में संबंधित हैं, और यद्यपि विभिन्न श्रेणियों की सजीव इकाइयों को बनाने के सबसे उच्च पद पर हैं, फिर भी वे अपनी स्थिति के प्रति सचेत हैं, कि वे न तो सर्वोच्च भगवान हैं और न ही सर्वोच्च रूप से शक्तिशाली हैं। यह संभव है कि ब्रह्मांड के भीतर या बाहर कुछ अत्यंत शक्तिशाली व्यक्तित्व कभी-कभी स्वयं भगवान से अधिक शक्ति दिखा सकते हैं। फिर भी शुद्ध भक्त जानता है कि यह शक्ति भगवान द्वारा प्रत्यायोजित एक विभूति है, और ऐसी प्रत्यायोजित शक्तिशाली सजीव इकाई कभी भी स्वतंत्र नहीं होती है। श्री हनुमानजी ने समुद्र के ऊपर से कूदकर हिंद महासागर पार किया, और भगवान श्री रामचंद्र खुद पुल के ऊपर से गुजरने में व्यस्त थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हनुमानजी भगवान से अधिक शक्तिशाली थे। कभी-कभी भगवान अपने भक्त को असाधारण शक्तियां देते हैं, लेकिन भक्त हमेशा जानता है कि शक्ति भगवत् व्यक्तित्व की है और वह केवल एक उपकरण है। शुद्ध भक्त कभी भी उन गैर-भक्तों की तरह घमंडी नहीं होता जो झूठे तरीके से सोचते हैं कि वे भगवान हैं। यह देखना आश्चर्यजनक है कि कैसे एक व्यक्ति जिसे भगवान की माया शक्ति के नियमों द्वारा हर कदम पर लात मारी जा रही है, वह झूठे तरीके से भगवान के साथ एक होने के बारे में सोच सकता है। यह सोच बद्ध आत्मा को दी गई माया शक्ति का अंतिम जाल है। पहला भ्रम यह है कि वह धन और शक्ति जमा करके भौतिक दुनिया का भगवान बनना चाहता है, लेकिन जब वह उस प्रयास में निराश हो जाता है तो वह भगवान के साथ एक होना चाहता है। इसलिए भौतिक दुनिया में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बनने और भगवान के साथ एक होने की इच्छा दोनों अलग-अलग भ्रामक जाल हैं। और क्योंकि भगवान के शुद्ध भक्त समर्पित आत्माएं हैं, इसलिए वे माया के भ्रामक जाल से ऊपर हैं। क्योंकि भगवान ब्रह्मा एक शुद्ध भक्त हैं, भले ही भौतिक दुनिया में पहला प्रधान देवता और इसलिए कई अद्भुत कार्य करने में सक्षम हैं, फिर भी वह कभी भी, ज्ञान के एक गरीब कोष वाले गैर-भक्त की तरह, भगवान के साथ एक होने की दुस्साहस नहीं करेंगे। ज्ञान के एक गरीब कोष वाले लोगों को ब्रह्मा से सबक लेना चाहिए जब वे भगवान बनने की झूठी धारणा से घमंडी होते हैं। वास्तविक रूप से भगवान ब्रह्मा सजीव इकाइयों का निर्माण नहीं करते हैं। सृष्टि की शुरुआत में उन्हें पिछली सहस्राब्दी के दौरान उनके काम के अनुसार सजीव इकाइयों को विभिन्न शारीरिक आकार देने का अधिकार दिया जाता है। ब्रह्माजी का कर्तव्य केवल सजीव इकाइयों को उनकी नींद से जगाना और उन्हें उनके उचित कर्तव्य में लगाना है। विभिन्न श्रेणियों की सजीव इकाइयों को ब्रह्माजी अपनी मनमानी सनक से नहीं बनाते हैं, लेकिन उन्हें सजीव इकाइयों को विभिन्न श्रेणियों का शरीर देने का कार्य सौंपा जाता है ताकि वे उसके अनुसार काम कर सकें। और फिर भी वह सचेत हैं कि वह केवल एक उपकरण हैं, ताकि वह स्वयं को सर्वोच्च शक्तिशाली भगवान न समझे। भगवान के भक्त भगवान द्वारा दिए गए विशिष्ट कर्तव्य में लगे हुए हैं, और ऐसे कर्तव्यों को बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक पूरा किया जाता है क्योंकि वे भगवान द्वारा नियत हैं। सफलता का श्रेय कर्ता को नहीं बल्कि भगवान को जाता है। लेकिन ज्ञान के एक गरीब कोष वाले व्यक्ति सफलता का श्रेय अपने खातों में लेते हैं और भगवान को श्रेय कुछ नहीं देते। यही गैर-भक्तों की निशानी है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥