श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.9.3 
यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययो: ।
रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
ज्यों ही जीवात्मा अपनी मूल महिमा में स्थित होकर काल और प्रकृति के परे आनंद का अनुभव करता है, वह जीवन के दो भ्रमों (मैं और मेरा) को त्यागकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
 
As soon as the soul is situated in its own natural glory and transcends the qualities of time and illusion, it gives up both the false concepts of life (I and mine) and manifests itself in its pure self.
तात्पर्य
जीवन की दो मिथ्या धारणाएँ, अर्थात् “मैं” और “मेरा,” निश्चित रूप से दो प्रकार के मनुष्यों में प्रकट होती हैं। निचली अवस्था में “मेरा” की अवधारणा बहुत प्रमुख होती है, और उच्च अवस्था में “मैं” की मिथ्या धारणा प्रमुख होती है। जीवन की पशु अवस्था में “मेरा” की मिथ्या धारणा बिल्लियों और कुत्तों की श्रेणी में भी बोधगम्य है, जो "मेरा" की एक ही गलत धारणा लेकर एक दूसरे से लड़ते हैं। मानव जीवन के निचले चरण में भी यही मिथ्या धारणा “यह मेरा शरीर है", “यह मेरा घर है”, “यह मेरा परिवार है”, “यह मेरी जाति है”, “यह मेरा राष्ट्र है”, “यह मेरा देश है”, आदि के रूप में प्रमुख है। और सट्टा ज्ञान के उच्च चरण में, “मेरा” की यही गलत धारणा “मैं हूँ”, या “यह सब मैं हूँ”, आदि में बदल जाती है। “मैं” और “मेरा” की एक ही मिथ्या धारणा को भिन्न-भिन्न रंगों में समझने वाले मनुष्यों के कई वर्ग होते हैं। परन्तु “मैं” का वास्तविक महत्व केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब कोई “मैं भगवान का शाश्वत सेवक हूँ” की चेतना में स्थित हो। यह शुद्ध चेतना है, और सम्पूर्ण वैदिक साहित्य हमें जीवन की इस अवधारणा की शिक्षा देता है। “मैं भगवान हूँ”, या “मैं सर्वोच्च हूँ" की गलतफहमी “मेरा” की गलतफहमी से अधिक खतरनाक है। यद्यपि वैदिक साहित्य में कभी-कभी अपने-आपको भगवान के साथ एक समझने के निर्देश होते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि मनुष्य हर तरह से भगवान के समान हो जाता है। निःसंदेह जीव भगवान के साथ कई तरह से एक है, लेकिन अंततः जीव भगवान के अधीनस्थ है, और वह संवैधानिक रूप से भगवान की इंद्रियों को संतुष्ट करने के लिए बना है। इसलिए भगवान बद्ध आत्माओं से उनके सामने समर्पण करने के लिए कहते हैं। यदि जीव सर्वोच्च इच्छा के अधीनस्थ नहीं होते, तो जीव को समर्पण करने के लिए क्यों कहा जाएगा? यदि जीव सभी तरह से समान होता, तो उसे माया के प्रभाव में क्यों डाला जाता? हम पहले भी कई बार चर्चा कर चुके हैं कि भौतिक ऊर्जा भगवान द्वारा नियंत्रित है। भगवद्गीता (9.10) भौतिक प्रकृति पर भगवान की इस नियंत्रण शक्ति की पुष्टि करती है। क्या एक जीव जो सर्वोच्च अस्तित्व के समान होने का दावा करता है, भौतिक प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है? मूर्ख “मैं” जवाब देगा कि वह भविष्य में ऐसा करेगा। यह स्वीकार करते हुए भी कि भविष्य में कोई भौतिक प्रकृति पर नियंत्रण करने वाला सर्वोच्च अस्तित्व के समान ही अच्छा नियंत्रक होगा, तो फिर कोई अभी भौतिक प्रकृति के नियंत्रण में क्यों है? भगवद्गीता कहती है कि भौतिक प्रकृति के नियंत्रण से सर्वोच्च भगवान के सामने समर्पण करके मुक्त हुआ जा सकता है, लेकिन अगर समर्पण नहीं किया जाता है, तो जीव कभी भी भौतिक प्रकृति को नियंत्रित नहीं कर पाएगा। अतः व्यक्ति को भक्ति सेवा के मार्ग का अभ्यास करके या भगवान की अलौकिक प्रेममयी सेवा में दृढ़ता से स्थित होकर इस “मैं” की गलतफहमी को भी त्याग देना चाहिए। बिना किसी रोजगार या व्यवसाय वाला एक गरीब आदमी जीवन में बहुत सी परेशानियों से गुजर सकता है, लेकिन अगर संयोग से वही आदमी को सरकार में अच्छी नौकरी मिल जाती है, तो वह तुरंत खुश हो जाता है। सभी ऊर्जाओं के नियंत्रक भगवान की सर्वोच्चता को नकारने में कोई लाभ नहीं है, लेकिन व्यक्ति को अपनी महिमा में ही सांविधानिक रूप से स्थित होना चाहिए, अर्थात् भगवान का शाश्वत सेवक होने की शुद्ध चेतना में स्थित होना चाहिए। अपने सशर्त जीवन में जीव भ्रामक माया का सेवक है, और अपनी मुक्त अवस्था में वह भगवान का शुद्ध, अयोग्य सेवक है। भगवान की सेवा में प्रवेश करने के लिए भौतिक प्रकृति के गुणों से अरंजित न होना योग्यता है। जब तक कोई मानसिक रचनाओं का सेवक है, तब तक वह “मैं” और “मेरा” की बीमारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकता।

परम सत्य मायावी ऊर्जा से अछूता है क्योंकि वह उस ऊर्जा का नियंत्रक है। सापेक्ष सत्य मायावी ऊर्जा में लिप्त होने के लिए उपयुक्त हैं। हालाँकि, सबसे अच्छा उद्देश्य तब पूरा होता है जब कोई सीधे परम सत्य का सामना कर रहा होता है, जैसे जब कोई सूर्य का सामना करता है। आकाश में ऊपर का सूर्य रोशनी से भरा होता है, पर जब सूर्य दिखाई देने वाले आकाश में नहीं होता है, तो सब कुछ अंधेरे में होता है। इसी तरह, जब कोई परम भगवान के आमने-सामने होता है, तो वह सभी भ्रमों से मुक्त हो जाता है, और जो ऐसा नहीं होता है वह भ्रामक माया के अंधेरे में होता है। भगवद गीता (14.26) इसकी पुष्टि इस प्रकार करती है:

माँ च योव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

इसलिए भक्ति-योग का विज्ञान, भगवान की आराधना, भगवान का गुणगान, श्रीमद्-भागवतम् को सही स्रोतों से सुनना (व्यावसायिक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों से जो जीवन में भागवतम् हैं) और हमेशा शुद्ध भक्तों की संगति में रहना, भक्ति को पूरा करना चाहिए। किसी को भी "मैं" और "मेरे" की गलत धारणाओं से गुमराह नहीं होना चाहिए। कर्म करने वाले "मेरा" की अवधारणा के शौकीन होते हैं, ज्ञानी "मैं" की अवधारणा के शौकीन होते हैं, और उन दोनों के पास भ्रामक ऊर्जा के बंधन से मुक्त होने की योग्यता नहीं होती है। श्रीमद्-भागवतम् और मुख्य रूप से, भगवद गीता दोनों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को "मैं" और "मेरा" की गलत धारणा से मुक्त करना है, और श्रील व्यासदेव ने पतित आत्माओं की मुक्ति के लिए उनका प्रसारण किया। जीव को उस पारलौकिक स्थिति में स्थित होना चाहिए जहां समय या भौतिक ऊर्जा का कोई प्रभाव नहीं है। सशर्त जीवन में जीव अतीत, वर्तमान और भविष्य के स्वप्न में समय के प्रभाव के अधीन होता है। ज्ञान और अहंकार पर विजय प्राप्त करने के माध्यम से आध्यात्मिक विचारक वासुदेव या स्वयं परम भगवान बनने की भविष्य की अटकलों द्वारा समय के प्रभाव को जीतने का प्रयास करता है। लेकिन यह प्रक्रिया सही नहीं है। सही प्रक्रिया यह है कि भगवान वासुदेव को हर चीज में सर्वोच्च के रूप में स्वीकार किया जाए, और ज्ञान को विकसित करने में सर्वोत्तम पूर्णता उसके प्रति आत्मसमर्पण करना है क्योंकि वही सब कुछ का स्रोत है। केवल उस अवधारणा में ही कोई व्यक्ति "मैं" और "मेरा" की गलत धारणा से छुटकारा पा सकता है। भगवद गीता और श्रीमद्-भागवतम् दोनों इसकी पुष्टि करते हैं। श्रील व्यासदेव ने विशेष रूप से भ्रमित जीवों को अपने महान साहित्य श्रीमद्-भागवतम् में ईश्वर का विज्ञान और भक्ति-योग की प्रक्रिया प्रदान की है, और सशर्त आत्मा को इस महान विज्ञान का पूरा लाभ उठाना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)