परम सत्य मायावी ऊर्जा से अछूता है क्योंकि वह उस ऊर्जा का नियंत्रक है। सापेक्ष सत्य मायावी ऊर्जा में लिप्त होने के लिए उपयुक्त हैं। हालाँकि, सबसे अच्छा उद्देश्य तब पूरा होता है जब कोई सीधे परम सत्य का सामना कर रहा होता है, जैसे जब कोई सूर्य का सामना करता है। आकाश में ऊपर का सूर्य रोशनी से भरा होता है, पर जब सूर्य दिखाई देने वाले आकाश में नहीं होता है, तो सब कुछ अंधेरे में होता है। इसी तरह, जब कोई परम भगवान के आमने-सामने होता है, तो वह सभी भ्रमों से मुक्त हो जाता है, और जो ऐसा नहीं होता है वह भ्रामक माया के अंधेरे में होता है। भगवद गीता (14.26) इसकी पुष्टि इस प्रकार करती है:
माँ च योव्यभिचारेण
भक्ति-योगेन सेवते
स गुणान समतीत्यैतान
ब्रह्म-भूयाय कल्पते
इसलिए भक्ति-योग का विज्ञान, भगवान की आराधना, भगवान का गुणगान, श्रीमद्-भागवतम् को सही स्रोतों से सुनना (व्यावसायिक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उन व्यक्तियों से जो जीवन में भागवतम् हैं) और हमेशा शुद्ध भक्तों की संगति में रहना, भक्ति को पूरा करना चाहिए। किसी को भी "मैं" और "मेरे" की गलत धारणाओं से गुमराह नहीं होना चाहिए। कर्म करने वाले "मेरा" की अवधारणा के शौकीन होते हैं, ज्ञानी "मैं" की अवधारणा के शौकीन होते हैं, और उन दोनों के पास भ्रामक ऊर्जा के बंधन से मुक्त होने की योग्यता नहीं होती है। श्रीमद्-भागवतम् और मुख्य रूप से, भगवद गीता दोनों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को "मैं" और "मेरा" की गलत धारणा से मुक्त करना है, और श्रील व्यासदेव ने पतित आत्माओं की मुक्ति के लिए उनका प्रसारण किया। जीव को उस पारलौकिक स्थिति में स्थित होना चाहिए जहां समय या भौतिक ऊर्जा का कोई प्रभाव नहीं है। सशर्त जीवन में जीव अतीत, वर्तमान और भविष्य के स्वप्न में समय के प्रभाव के अधीन होता है। ज्ञान और अहंकार पर विजय प्राप्त करने के माध्यम से आध्यात्मिक विचारक वासुदेव या स्वयं परम भगवान बनने की भविष्य की अटकलों द्वारा समय के प्रभाव को जीतने का प्रयास करता है। लेकिन यह प्रक्रिया सही नहीं है। सही प्रक्रिया यह है कि भगवान वासुदेव को हर चीज में सर्वोच्च के रूप में स्वीकार किया जाए, और ज्ञान को विकसित करने में सर्वोत्तम पूर्णता उसके प्रति आत्मसमर्पण करना है क्योंकि वही सब कुछ का स्रोत है। केवल उस अवधारणा में ही कोई व्यक्ति "मैं" और "मेरा" की गलत धारणा से छुटकारा पा सकता है। भगवद गीता और श्रीमद्-भागवतम् दोनों इसकी पुष्टि करते हैं। श्रील व्यासदेव ने विशेष रूप से भ्रमित जीवों को अपने महान साहित्य श्रीमद्-भागवतम् में ईश्वर का विज्ञान और भक्ति-योग की प्रक्रिया प्रदान की है, और सशर्त आत्मा को इस महान विज्ञान का पूरा लाभ उठाना चाहिए।
