यथात्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम् ।
विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना ॥ २७ ॥
अनुवाद
तथा हे स्वामी! अनुग्रह करके मुझे यह भी बताइए कि आप विभिन्न संयोगों द्वारा संहार, उत्पत्ति, स्वीकृति तथा पालन की विभिन्न शक्तियों को कैसे प्रकट करते हैं?
And also kindly tell me how, through various combinations, You manifest from Yourself the various powers of destruction, creation, acceptance and preservation.
तात्पर्य
संपूर्ण प्रकट होने वाले स्वयं प्रभु ही हैं जो अपनी भिन्न ऊर्जाओं के फैलने से हैं, जैसे कि आंतरिक, बाह्य और सीमांत स्पष्टतः, जैसे कि सूर्य का प्रकाश सूर्य ग्रह की ऊर्जा का प्रकट होना है। ऐसी ऊर्जा भगवान के साथ एक है और भगवान से अलग है, जैसे कि धूप एक साथ सूर्य ग्रह से एक है और उससे अलग भी है। ऊर्जायें प्रभु के संकेत से संयोजन और क्रमादेश द्वारा कार्य करती हैं, और कार्यकारी एजेंट, जैसे कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव, भी भगवान के विभिन्न अवतार हैं। दूसरे शब्दों में, प्रभु के अलावा कुछ भी नहीं है, और फिर भी प्रभु ऐसी सभी प्रकट हो रही गतिविधियों से अलग हैं। यह कैसे होता है इसे बाद में समझाया जाएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥