अनिम्नवादी सलाह देते हैं कि एक व्यक्ति को इच्छाहीन होना चाहिए, और अन्य लोग इच्छाओं को पूरी तरह से मिटा देने की सलाह देते हैं। यह असंभव है; कोई भी इच्छाओं को पूरी तरह से मिटा नहीं सकता क्योंकि इच्छा करना जीवन का एक लक्षण है। इच्छा न होने पर जीव मर जाता, जो कि वह नहीं है। इसलिए, जीवित रहने की स्थितियाँ और इच्छाएँ एक साथ चलती हैं। इच्छाओं की पूर्णता तब प्राप्त की जा सकती है जब कोई भगवान की सेवा करना चाहता है, और भगवान भी यही चाहता है कि हर जीव अपनी सभी व्यक्तिगत इच्छाओं को त्याग दें और उसकी इच्छाओं के साथ सहयोग करें। भगवद्-गीता का यही अंतिम निर्देश है। ब्रह्माजी इस प्रस्ताव से सहमत हुए, और इसलिए उन्हें शून्य ब्रह्मांड में पीढ़ियों के निर्माण का जिम्मेदार पद दिया गया। इसलिए भगवान के साथ एकता का अर्थ है अपनी इच्छाओं को परम भगवान की इच्छाओं के साथ जोड़ना। ऐसा करने पर सभी इच्छाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
प्रत्येक जीवित प्राणी के हृदय में पूर्ण आत्मा के रूप में भगवान जानता है कि प्रत्येक जीवित प्राणी के मन में क्या है, और कोई भी कुछ भी नहीं कर सकता है भगवान के बिना। अपनी श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता से, भगवान हर किसी को अपनी इच्छाओं को पूरी तरह से पूरा करने का मौका देता है, और परिणामस्वरूप होने वाली प्रतिक्रिया भी भगवान द्वारा ही दी जाती है।
