सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुन: ।
बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तप: ॥ २४ ॥
अनुवाद
मैं इस ब्रह्मांड की रचना ऐसे ही तप के द्वारा करता हूँ, मैं इसी शक्ति से इसका संचालन करता हूँ, और इसी शक्ति से इस ब्रह्मांड को वापस अपने में समाहित कर लेता हूँ। इसलिए तप ही वास्तविक शक्ति है।
It is with this kind of austerity that I create this world, it is with this power that I maintain it and it is with this that I absorb it into myself. Hence austerity is the real power.
तात्पर्य
प्रायश्चित्त करते समय, व्यक्ति को गृह, वापस भगवान के पास लौटने के लिए दृढ़ होना चाहिए और उस उद्देश्य के लिए सभी प्रकार के कष्टों का सामना करने का निश्चय करना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक समृद्धि और नाम और प्रसिद्धि के लिए भी कठोर प्रकार के प्रायश्चित्त को सहित होने पड़ते हैं, अन्यथा कोई भी इस भौतिक जगत में महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं बन सकता है। फिर, भक्ति सेवा की पूर्णता के लिए कठोर प्रकार के प्रायश्चित्त क्यों नहीं होने चाहिए? एक आसान जीवन और अलौकिक साक्षात्कार की प्राप्ति साथ-साथ नहीं चल सकती। प्रभु किसी भी जीवित प्राणी से अधिक चतुर हैं; इसलिए वह यह देखना चाहते हैं कि भक्त भक्ति सेवा में कितना परिश्रमी है। आदेश प्रभु से मिलता है, या तो सीधे या वास्तविक आध्यात्मिक गुरु के माध्यम से, और उस आदेश का पालन करना, चाहे कितना भी कष्टसाध्य क्यों न हो, कठोर प्रकार का प्रायश्चित्त है। जो व्यक्ति इस सिद्धांत का दृढ़ता से पालन करता है, वह निश्चित रूप से प्रभु की दया को प्राप्त करने में सफल होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥