प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।
तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ ॥ २३ ॥
अनुवाद
हे पापरहित ब्रह्मा, यह जान लो कि जब तुम अपने कर्तव्य में उलझे हुए थे, तो मैंने ही तुम्हें पहली बार तपस्या करने का निर्देश दिया था। यह तपस्या ही मेरा हृदय और मेरी आत्मा है, इसलिए तपस्या और मैं एक ही हैं।
O sinless Brahma, you must know that when you were confused about your duty, I was the first one to order you to perform penance. Such penance is my heart and my soul, and hence penance is inseparable from me.
तात्पर्य
वह तप जिससे परमात्मा के साक्षात दर्शन हो सकते हैं भगवान के प्रति भक्ति सेवा से भिन्न कुछ नहीं है क्योंकि भगवत प्रेम में भक्ति सेवा का सम्पादन करने से ही भगवान के निकट पहुँचा जा सकता है। इस प्रकार का तप भगवान की आंतरिक शक्ति है और उनसे भिन्न नहीं है। आंतरिक शक्ति के ऐसे कृत्य भौतिक सुखों के प्रति अनासक्ति से प्रदर्शित होते हैं। जीवों को भौतिक बंधन की स्थितियों में बंदी बनाया जाता है क्योंकि उनके अधिपति बनने की प्रवृत्ति होती है। लेकिन भगवान की भक्ति सेवा में संलग्न होने से व्यक्ति इस भोग भावना से अलग हो जाता है। भक्त स्वचालित रूप से सांसारिक आनंद से अलग हो जाते हैं, और यह अलगाव परिपूर्ण ज्ञान का परिणाम है। इसलिए भक्ति सेवा के तप में ज्ञान और अलगाव दोनों शामिल हैं और यही उस दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति है। यदि कोई गृह वापसी, वापस परमात्मा के पास जाना चाहता है, तो वह भौतिक, भ्रामक समृद्धि का आनंद नहीं ले सकता। जो व्यक्ति भगवान के साथ साहचर्य में दिव्य आनंद की जानकारी नहीं रखता, वह मूर्खतापूर्वक इस अस्थायी भौतिक खुशी का आनंद लेना चाहता है। चैतन्य-चरितामृत में कहा गया है कि यदि कोई ईमानदारी से भगवान को देखना चाहता है और साथ ही इस भौतिक दुनिया का आनंद लेना चाहता है, तो उसे केवल एक मूर्ख माना जाता है। जो भौतिक आनंद के लिए यहाँ भौतिक दुनिया में रहना चाहता है, उसे ईश्वर के शाश्वत राज्य में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है। भगवान ऐसे मूर्ख भक्त पर कृपा करते हुए भौतिक दुनिया में उसके पास जो कुछ भी हो सकता है उसे छीन लेते हैं। यदि भगवान का ऐसा मूर्ख भक्त अपनी स्थिति फिर से पाने की कोशिश करता है, तो दयालु भगवान उसके पास जो कुछ भी हो सकता है उसे फिर से छीन लेते हैं। भौतिक समृद्धि में इस तरह की बार-बार असफलताओं के कारण वह अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच बहुत अलोकप्रिय हो जाता है। भौतिक दुनिया में परिवार के सदस्य और दोस्त उन लोगों का सम्मान करते हैं जो किसी भी तरह से धन संचय करने में बहुत सफल होते हैं। इस प्रकार, भगवान की कृपा से भगवान के मूर्ख भक्त को जबरन तपस्या में डाल दिया जाता है और अंत में भक्त पूरी तरह से खुश हो जाता है, भगवान की सेवा में तल्लीन हो जाता है। इसलिए भगवान की भक्ति सेवा में तपस्या, या तो स्वैच्छिक रूप से समर्पण करके या भगवान द्वारा मजबूर किए जाने से, पूर्णता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, और इस प्रकार यह तपस्या भगवान की आंतरिक शक्ति है। हालाँकि, कोई व्यक्ति बिना सभी पापों से पूरी तरह मुक्त हुए भक्ति सेवा की तपस्या में नहीं लगा सकता। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, केवल वही व्यक्ति जो पापों की सभी प्रतिक्रियाओं से पूरी तरह मुक्त होता है, वह भगवान की आराधना में खुद को समर्पित कर सकता है। ब्रह्माजी पापरहित थे, और इसलिए उन्होंने ईमानदारी से भगवान की सलाह का पालन किया, "तप, तप", और भगवान, उनसे संतुष्ट होकर, उन्हें वांछित परिणाम प्रदान किया। इसलिए केवल प्रेम और तपस्या के संयोजन से ही भगवान प्रसन्न हो सकते हैं, और इस प्रकार व्यक्ति उनकी पूर्ण दया प्राप्त कर पाता है। वह पापरहित को निर्देशित करता है, और पापरहित भक्त जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥