ज्ञान प्रयासम उदपास्य नमंत एव
जीवंति सन्मुखरितं भवदीया वार्तम
स्थान स्थिताः श्रुति-गतां तनु-वां-मनोभिः
ये प्रायशोऽजित जितोsपि असि तै त्रिलोक्यं
भगवान् ब्रह्मा ने कहा, " हे मेरे प्रभु कृष्ण, एक भक्त जो सर्वोच्च के अस्तित्व में विलीन होने के उद्देश्य से अनुभवजन्य दार्शनिक अटकल के मार्ग को त्याग देता है और अपने आपको एक वास्तविक साधु या संत से आपकी महिमा और गतिविधियों को सुनने में संलग्न करता है, और अपने सामाजिक जीवन के व्यावसायिक कार्य में एक ईमानदार जीवन जीता है, वह आपकी सहानुभूति और दया को जीत सकता है, भले ही आप अजीत या अजेय हों।" (भागवत 10.14.3) यह परमहंसों का मार्ग है, जिसका व्यक्तिगत रूप से पालन भगवान ब्रह्मा ने किया था और बाद में जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए इसकी सिफारिश की थी।
