श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.9.18 
तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुतान्तरो
हृष्यत्तनु: प्रेमभराश्रुलोचन: ।
ननाम पादाम्बुजमस्य विश्वसृग्
यत् पारमहंस्येन पथाधिगम्यते ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार से श्री हरि के पूर्ण रूप का दर्शन करके ब्रह्मा जी का मन पूर्ण आनंद से भर उठा और दिव्य प्रेम तथा आनंद के कारण उनकी आँखों में प्रेम के आँसू आ गए। वे भगवान के सम्मुख नतमस्तक हो गये। जीवात्मा (परमहंस) के लिए सर्वोच्च सिद्धि का यही तरीका है।
 
Seeing the Lord in His full form, Brahma's heart was filled with joy and tears of love came to his eyes out of divine love and bliss. He bowed down before the Lord. This is the method of ultimate success for a living being (Paramhansa).
तात्पर्य
श्रीमद्-भागवतम की शुरुआत में कहा गया है कि यह महान साहित्य परमहंसों के लिए है। परमो निर्मत्सराणां सताम अर्थात श्रीमद्-भागवतम उन लोगों के लिए है जो पूरी तरह से द्वेष से मुक्त हैं। सशर्त जीवन में द्वेषपूर्ण जीवन सबसे ऊपर से शुरू होता है, जिसका अर्थ है भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रति द्वेष रखना। भगवान का व्यक्तित्व सभी प्रकट शास्त्रों में एक स्थापित तथ्य है, और भगवद-गीता में सर्वोच्च भगवान की व्यक्तिगत विशेषता का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है, इतना कि महान साहित्य के अंतिम भाग ने जोर देकर कहा है कि जीवन के दुखों से बचने के लिए भगवान के व्यक्तित्व के सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए। दुर्भाग्य से, अधर्मी पृष्ठभूमि वाले लोग भगवान के व्यक्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं और हर कोई बिना किसी योग्यता के स्वयं भगवान बनना चाहता है। सशर्त आत्मा में यह द्वेषपूर्ण प्रकृति तब तक जारी रहती है जब तक कि कोई व्यक्ति प्रभु के साथ एक नहीं होना चाहता, और इस प्रकार सबसे महान अनुभववादी दार्शनिक भी सर्वोच्च भगवान के साथ एक बनने पर विचार करते हुए परमहंस नहीं बन सकते क्योंकि द्वेषपूर्ण मन वहाँ है। इसलिए परमहंस जीवन की अवस्था केवल उन्हीं लोगों द्वारा प्राप्त की जा सकती है जो भक्ति-योग के अभ्यास में स्थिर हैं। यह भक्ति-योग शुरू होता है यदि किसी व्यक्ति का यह दृढ़ विश्वास है कि केवल पूर्ण पारलौकिक प्रेम में भगवान के लिए भक्ति सेवा का निर्वहन उसे जीवन की सर्वोच्च पूर्णता की स्थिति तक ऊपर उठा सकता है। ब्रह्माजी को भक्ति-योग की इस कला में विश्वास था; वह तप करने के लिए भगवान के निर्देश में विश्वास करते थे, और उन्होंने महान तपस्या के साथ कार्य का निर्वहन किया और इस तरह वैकुण्ठलोक और भगवान को भी व्यक्तिगत अनुभव से देखने की महान सफलता प्राप्त की। कोई भी मन या मशीन के किसी भी यांत्रिक साधन से सर्वोच्च भगवान के निवास तक नहीं पहुँच सकता है, लेकिन कोई भी केवल भक्ति-योग की प्रक्रिया का पालन करके वैकुण्ठलोक के निवास तक पहुँच सकता है क्योंकि भगवान को केवल भक्ति-योग प्रक्रिया के माध्यम से ही महसूस किया जा सकता है। भगवान ब्रह्माजी वास्तव में अपने कमल के आसन पर बैठे थे, और वहाँ से, बड़ी गंभीरता से भक्ति-योग की प्रक्रिया को अंजाम देकर, वह वैकुण्ठलोक को सभी विविधताओं के साथ-साथ भगवान को व्यक्तिगत रूप से और उनके सहयोगियों को देख सकते थे। भगवान ब्रह्मा के नक्शेकदम पर चलते हुए, कोई भी व्यक्ति, आज भी, यहाँ बताए गए अनुसार परमहंस के मार्ग का अनुसरण करके वही सिद्धि प्राप्त कर सकता है। भगवान चैतन्य ने भी इस युग में पुरुषों के लिए आत्म-साक्षात्कार की इस पद्धति को स्वीकार किया। व्यक्ति को सबसे पहले, पूरे विश्वास के साथ, भगवान श्री कृष्ण के व्यक्तित्व पर विश्वास करना चाहिए, और बिना किसी सट्टा दर्शन द्वारा उन्हें महसूस करने के प्रयास किए बिना, उनके बारे में श्रीमद् भगवद-गीता से और बाद में श्रीमद्-भागवतम के पाठ से सुनना चाहिए। इस तरह के प्रवचन किसी व्यक्ति भागवतम से और किसी पेशेवर व्यक्ति या कर्मि, ज्ञानी या योगी से नहीं सुनने चाहिए। यह विज्ञान सीखने का रहस्य है। जीवन के त्यागी क्रम में रहने की आवश्यकता नहीं है; वह अपने वर्तमान जीवन स्थिति में रह सकता है, लेकिन उसे भगवान के एक वास्तविक भक्त की संगति की तलाश करनी चाहिए और उनसे विश्वास और दृढ़ विश्वास के साथ भगवान के पारलौकिक संदेश को सुनना चाहिए। यहाँ परमहंस का यही मार्ग बताया गया है। भगवान के विभिन्न पवित्र नामों में, उन्हें अजित भी कहा जाता है, या जिसे कोई और कभी जीत नहीं सकता। फिर भी उन्हें परमहंस पथ द्वारा जीता जा सकता है, जैसा कि महान आध्यात्मिक गुरु भगवान ब्रह्मा ने व्यावहारिक रूप से महसूस किया और दिखाया। भगवान ब्रह्मा ने व्यक्तिगत रूप से अपने शब्दों में इस परमहंस-पंथा की सिफारिश की है:

ज्ञान प्रयासम उदपास्य नमंत एव

जीवंति सन्मुखरितं भवदीया वार्तम

स्थान स्थिताः श्रुति-गतां तनु-वां-मनोभिः

ये प्रायशोऽजित जितोsपि असि तै त्रिलोक्यं

भगवान् ब्रह्मा ने कहा, " हे मेरे प्रभु कृष्ण, एक भक्त जो सर्वोच्च के अस्तित्व में विलीन होने के उद्देश्य से अनुभवजन्य दार्शनिक अटकल के मार्ग को त्याग देता है और अपने आपको एक वास्तविक साधु या संत से आपकी महिमा और गतिविधियों को सुनने में संलग्न करता है, और अपने सामाजिक जीवन के व्यावसायिक कार्य में एक ईमानदार जीवन जीता है, वह आपकी सहानुभूति और दया को जीत सकता है, भले ही आप अजीत या अजेय हों।" (भागवत 10.14.3) यह परमहंसों का मार्ग है, जिसका व्यक्तिगत रूप से पालन भगवान ब्रह्मा ने किया था और बाद में जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त करने के लिए इसकी सिफारिश की थी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)