श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 9: श्रीभगवान् के वचन का उद्धरण देते हुए प्रश्नों के उत्तर  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.9.17 
अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं
वृतं चतु:षोडशपञ्चशक्तिभि: ।
युक्तं भगै: स्वैरितरत्र चाध्रुवै:
स्व एव धामन् रममाणमीश्वरम् ॥ १७ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान अपने सिंहासन पर विराजमान थे और उनके चारों ओर चार, सोलह, पाँच और छह प्राकृतिक ऐश्वर्यों वाली विभिन्न शक्तियाँ थीं। उनके साथ ही अस्थायी प्रकृति की अन्य छोटी शक्तियाँ भी थीं। लेकिन वे वास्तविक परमेश्वर थे और अपने धाम में आनंद ले रहे थे।
 
The Lord was seated on His throne and was surrounded by various energies—four, sixteen, five and six natural opulences—and other smaller and temporary energies. But He was the real Supreme Lord and was enjoying His abode.
तात्पर्य
प्रभु स्वाभाविक रूप से अपनी छह सम्पदाओं से सम्पन्न हैं। विशेष रूप से, वह सबसे धनी हैं, वही सबसे शक्तिशाली हैं, वही सबसे प्रसिद्ध हैं, वही सबसे सुन्दर हैं, वही ज्ञान में श्रेष्ठ हैं, और वही सबसे बड़े त्यागी भी हैं। और अपनी भौतिक रचनात्मक ऊर्जाओं के लिए, उनकी सेवा चार द्वारा की जाती है, अर्थात् प्रकृति, पुरुष, महतत्त्व और अहंकार के सिद्धांत हैं। उनकी सेवा सोलह द्वारा भी की जाती है, अर्थात् पाँच तत्व (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश), पाँच संवेदी अंग (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा), पाँच कार्यशील इंद्रिय अंग (हाथ, पैर, पेट, मल त्यागने का रास्ता और जननांग) और मन। पाँच में इंद्रियों के विषय शामिल हैं, अर्थात् रूप, स्वाद, गंध, ध्वनि और स्पर्श। ये सभी पच्चीस वस्तुएँ भौतिक सृजन में प्रभु की सेवा करती हैं, और ये सभी प्रभु की सेवा के लिए व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हैं। आठ की अल्प सम्पदाएँ (अष्ट-सिद्धियाँ, जो योगियों द्वारा अस्थायी प्रभुता के लिए प्राप्त की जाती हैं) भी उनके नियंत्रण में हैं, लेकिन वह स्वाभाविक रूप से बिना किसी प्रयास के ऐसी सभी शक्तियों से पूर्ण हैं, और इसलिए वह परम प्रभु हैं।

जीव, कठोर तपस्या और शारीरिक व्यायाम के प्रदर्शन द्वारा, अस्थायी रूप से कुछ अद्भुत शक्ति प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह उसे परम प्रभु नहीं बनाता है। परम प्रभु, अपनी शक्ति से, किसी भी योगी से असीमित रूप से अधिक शक्तिशाली हैं, वह किसी भी ज्ञानी की तुलना में असीमित रूप से अधिक विद्वान हैं, वह किसी भी धनी व्यक्ति से असीमित रूप से अधिक धनी हैं, वह किसी भी सुंदर जीव की तुलना में असीमित रूप से अधिक सुंदर हैं, और वह किसी भी परोपकारी की तुलना में असीमित रूप से अधिक दानी हैं। वह सबसे ऊपर हैं; कोई भी उनके बराबर या उनसे बड़ा नहीं है। न ही कोई किसी भी तप या योगिक प्रदर्शनों द्वारा उपरोक्त शक्तियों में उनके पूर्णता के स्तर तक पहुँच सकता है। योगी उनकी दया पर निर्भर हैं। उनके अत्यधिक दयालु स्वभाव से वह योगियों को उनके बारे में तड़पने के कारण कुछ अस्थायी शक्तियाँ प्रदान कर सकते हैं, लेकिन अपने अविभाजित भक्तों के लिए, जो प्रभु से उनकी पारलौकिक सेवा को छोड़कर और कुछ भी नहीं चाहते हैं, प्रभु इतने प्रसन्न होते हैं कि वह अविभाजित सेवा के बदले में खुद को दे देते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)