जैसा कि श्रील जीव गोस्वामी द्वारा उद्धृत किया गया है, हम नारद-पंचरात्र से जान सकते हैं कि पारलौकिक दुनिया या वैकुण्ठ वातावरण पारलौकिक गुणों से समृद्ध है। ये पारलौकिक गुण, जैसा कि प्रभु की भक्ति सेवा के माध्यम से पता चलता है, अज्ञानता, जुनून और अच्छाई के सांसारिक गुणों से अलग हैं। ऐसे गुण गैर-भक्त पुरुषों के वर्ग द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। पद्म पुराण, उत्तर-खंड में, यह कहा गया है कि ईश्वर की सृष्टि के एक-चौथाई भाग से आगे तीन-चौथाई प्रकट है। भौतिक अभिव्यक्ति और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति के बीच सीमा रेखा विराज नदी है, और विराज से परे, जो प्रभु के शरीर के पसीने से बहने वाली एक दिव्य धारा है, ईश्वर की सृष्टि का तीन-चौथाई प्रकटीकरण है। यह भाग शाश्वत, शाश्वत, बिना गिरावट के और असीमित है, और इसमें रहने की स्थिति का उच्चतम पूर्ण स्तर है। सांख्य-कौमुदी में कहा गया है कि अमिश्र अच्छाई या श्रेष्ठता भौतिक मोड के बिल्कुल विपरीत है। वहां सभी जीवित संस्थाएं बिना किसी विराम के शाश्वत रूप से जुड़ी हुई हैं, और भगवान मुख्य और प्रमुख इकाई हैं। आगम पुराणों में भी, दिव्य निवास का वर्णन इस प्रकार किया गया है: वहां के सहयोगी सदस्य भगवान की रचना के भीतर कहीं भी जाने के लिए स्वतंत्र हैं, और ऐसी रचना की कोई सीमा नहीं है, विशेष रूप से तीन-चौथाई परिमाण के क्षेत्र में। चूंकि उस क्षेत्र की प्रकृति असीमित है, इसलिए इस तरह के जुड़ाव का कोई इतिहास नहीं है, न ही इसका अंत है। निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि अज्ञानता और जुनून के सांसारिक गुणों की पूर्ण अनुपस्थिति के कारण, निर्माण का कोई प्रश्न नहीं है और न ही विनाश का। भौतिक दुनिया में सब कुछ बनाया गया है, और सब कुछ नष्ट हो गया है, और सृजन और विनाश के बीच जीवन की अवधि अस्थायी है। पारलौकिक क्षेत्र में कोई सृजन और कोई विनाश नहीं है, और इस प्रकार जीवन की अवधि अनंत रूप से अनंत है। दूसरे शब्दों में, पारलौकिक दुनिया में सब कुछ अविनाशी है, बिना किसी गिरावट के ज्ञान और आनंद से भरा हुआ है। चूंकि कोई गिरावट नहीं है, इसलिए समय के अनुमान में कोई अतीत, वर्तमान और भविष्य नहीं है। इस श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि समय का प्रभाव इसकी अनुपस्थिति से स्पष्ट है। संपूर्ण भौतिक अस्तित्व उन तत्वों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से प्रकट होता है जो अतीत, वर्तमान और भविष्य के मामले में समय के प्रभाव को प्रमुख बनाते हैं। वहां कारण और प्रभाव की ऐसी कोई क्रिया और प्रतिक्रिया नहीं है, इसलिए जन्म, विकास, अस्तित्व, परिवर्तन, गिरावट और विनाश का चक्र - छह भौतिक परिवर्तन - वहां मौजूद नहीं हैं। यह भौतिक दुनिया में अनुभव की गई भ्रम के बिना, भगवान की ऊर्जा की अमिश्र अभिव्यक्ति है। संपूर्ण वैकुण्ठ अस्तित्व घोषणा करता है कि वहां हर कोई प्रभु का अनुयायी है। भगवान वहां मुख्य नेता हैं, बिना नेतृत्व के लिए कोई प्रतिस्पर्धा किए, और सामान्य लोग सभी प्रभु के अनुयायी हैं। इसलिए वेदों में पुष्टि की गई है कि प्रभु ही मुख्य नेता हैं और अन्य सभी जीवित संस्थाएं उनके अधीन हैं, क्योंकि केवल प्रभु ही अन्य सभी जीवित संस्थाओं की सभी जरूरतों को पूरा करते हैं।
