अब अगला प्रश्न अपने आप बनेगा तो वह यह कि भगवान जीवित इकाई को इस तरह की चेतना और विस्मृति में क्यों प्रभावित करते हैं। उत्तर यह है कि भगवान स्पष्ट रूप से चाहते हैं कि प्रत्येक जीवित इकाई भगवान के एक अंग और पार्सल के रूप में अपनी शुद्ध चेतना में रहे और इस प्रकार भगवान की प्रेममयी सेवा में लगे रहे क्योंकि वह संविधान रूप से बने हैं; लेकिन क्योंकि जीवित इकाई भी आंशिक रूप से स्वतंत्र है, वह भगवान की सेवा करने के लिए तैयार नहीं हो सकता है, लेकिन वह भगवान की तरह स्वतंत्र बनने का प्रयास कर सकता है। सभी गैर-भक्त जीवित इकाइयाँ भगवान के समान ही शक्तिशाली बनने के इच्छुक हैं, यद्यपि वे ऐसा बनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जीवित इकाइयों को भगवान की इच्छा से मोह हो जाता है क्योंकि वे उनके जैसे बनना चाहते थे। उस व्यक्ति की तरह जो आवश्यक योग्यता के बिना राजा बनने के बारे में सोचता है, जब जीवित इकाई स्वयं भगवान बनने की इच्छा करता है, तो उसे यह सपना देखने की स्थिति में डाल दिया जाता है कि वह एक राजा है। इसलिए जीवित इकाई की पहली पापी इच्छा भगवान बनना है, और भगवान की परिणामी इच्छा यह है कि जीवित इकाई अपने वास्तविक जीवन को भूल जाए और इस तरह उस यूटोपिया की भूमि का सपना देखे जहाँ वह भगवान की तरह एक हो सकता है। बच्चा माँ से चाँद लेने के लिए रोता है, और माँ चाँद के प्रतिबिंब से रोते और परेशान बच्चे को संतुष्ट करने के लिए बच्चे को दर्पण देती है। इसी तरह, भगवान के रोते हुए बच्चे को प्रतिबिंब, भौतिक दुनिया को कर्मी के रूप में सौंप दिया जाता है और भगवान के साथ एक होकर निराशा में इसे छोड़ दिया जाता है। ये दोनों अवस्थाएँ केवल भ्रमपूर्ण सपने ही हैं। जीवित इकाई ने कब यह इच्छा की, इसके इतिहास का पता लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन तथ्य यह है कि जैसे ही उसने इसकी इच्छा की, उसे भगवान के निर्देशन से आत्म-माया के नियंत्रण में डाल दिया गया। इसलिए अपनी भौतिक स्थिति में जीवित इकाई झूठा सपना देख रहा है कि यह "मेरा" है और यह "मैं" हूँ। सपना यह है कि वातानुकूलित आत्मा अपने भौतिक शरीर को "मैं" के रूप में सोचती है या झूठे तौर पर सोचती है कि वह भगवान है और उस भौतिक शरीर के संबंध में सब कुछ "मेरा" है। इस प्रकार केवल सपने में ही "मैं" और "मेरा" की भ्रांति जीवन के बाद जीवन जारी रहती है। यह जीवन के बाद जीवन जारी रहता है, जब तक कि जीवित इकाई भगवान के अधीनस्थ भाग और पार्सल के रूप में अपनी पहचान के बारे में विशुद्ध रूप से सचेत नहीं है।
हालाँकि, उसकी शुद्ध चेतना में, ऐसा कोई गलत सपना नहीं है, और उस शुद्ध चेतन अवस्था में जीवित इकाई यह नहीं भूलता है कि वह स्वयं कभी भगवान नहीं है, लेकिन वह हमेशा के लिए परमात्मा प्रेम में भगवान का सेवक है।
