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श्लोक 2.7.8  |
विद्ध: सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो
बालोऽपि सन्नुपगतस्तपसे वनानि ।
तस्मा अदाद् ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो
दिव्या: स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८ ॥ |
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| अनुवाद |
| राजा की उपस्थिति में सौतेली माँ के कटु वचनों से अपमान सहकर राजकुमार ध्रुव, बालक होते हुए भी, वन में जाकर कठोर तप करने लगे। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें ध्रुवलोक प्रदान किया। ध्रुवलोक की पूजा सभी मुनि-ऋषि करते हैं। |
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| राजा की उपस्थिति में सौतेली माँ के कटु वचनों से अपमान सहकर राजकुमार ध्रुव, बालक होते हुए भी, वन में जाकर कठोर तप करने लगे। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें ध्रुवलोक प्रदान किया। ध्रुवलोक की पूजा सभी मुनि-ऋषि करते हैं। |
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