श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  2.7.53 
मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदत: ।
श‍ृण्वत: श्रद्धया नित्यं माययात्मा न मुह्यति ॥ ५३ ॥
 
 
अनुवाद
प्रभु की विभिन्न शक्तियों के साथ होने वाली उनकी गतिविधियों और कार्यों का, परमेश्वर के उपदेशों के अनुसार वर्णन, प्रशंसा और श्रवण करना चाहिए। यदि श्रद्धा और सम्मानपूर्वक नियमित रूप से ऐसा किया जाता है, तो मनुष्य निश्चित रूप से प्रभु की माया से मुक्त हो जाता है।
 
प्रभु की विभिन्न शक्तियों के साथ होने वाली उनकी गतिविधियों और कार्यों का, परमेश्वर के उपदेशों के अनुसार वर्णन, प्रशंसा और श्रवण करना चाहिए। यदि श्रद्धा और सम्मानपूर्वक नियमित रूप से ऐसा किया जाता है, तो मनुष्य निश्चित रूप से प्रभु की माया से मुक्त हो जाता है।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दो के अंतर्गत सातवाँ अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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