श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.7.5 
तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे
आदौ सनात् स्वतपस: स चतु:सनोऽभूत् ।
प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं
सम्यग् जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
विभिन्न लोकों की उत्पत्ति करने के लिए मैंने तपस्या की और तब प्रभु ने मुझसे प्रसन्न होकर चार कुमारों (सनक, सनत्कुमार, सनन्दन और सनातन) के रूप में अवतार लिया। पिछली सृष्टि में आध्यात्मिक सत्य का विनाश हो चुका था, लेकिन इन चारों कुमारों ने इतनी स्पष्ट और सुंदर व्याख्या की कि ऋषियों को तुरंत सत्य का साक्षात्कार हो गया।
 
विभिन्न लोकों की उत्पत्ति करने के लिए मैंने तपस्या की और तब प्रभु ने मुझसे प्रसन्न होकर चार कुमारों (सनक, सनत्कुमार, सनन्दन और सनातन) के रूप में अवतार लिया। पिछली सृष्टि में आध्यात्मिक सत्य का विनाश हो चुका था, लेकिन इन चारों कुमारों ने इतनी स्पष्ट और सुंदर व्याख्या की कि ऋषियों को तुरंत सत्य का साक्षात्कार हो गया।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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