इसलिए, प्रत्येक का यह कर्तव्य है कि वह अपना वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए केवल भगवान की निष्ठापूर्वक आराधना करे। निर्वैयक्तिकवादी, तर्क-वितर्क करने या ध्यान करने के बजाय, भगवान की नियमित भक्ति सेवा सीधे कर सकता है और इस प्रकार आसानी से वांछित लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
हालाँकि, भक्त स्वाभाविक रूप से भगवान के सहयोगी बनने के लिए इच्छुक होते हैं और निर्वैयक्तिकवादी द्वारा परिकल्पित आध्यात्मिक अस्तित्व में विलय नहीं होना चाहते हैं। इसलिए, भक्त, अपनी आध्यात्मिक प्रवृत्तियों का पालन करते हुए, भगवान के सेवक, मित्र, पिता, माता या वैवाहिक प्रेमी बनने के अपने वांछित लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। भगवान की भक्ति सेवा में नौ पारलौकिक प्रक्रियाएँ शामिल हैं, जैसे सुनना और जप करना, और इस तरह की आसान और स्वाभाविक भक्ति सेवाओं को करने से भक्त उच्चतम पूर्णता के परिणाम प्राप्त करते हैं, जो ब्रह्म के अस्तित्व में विलय होने से कहीं अधिक श्रेष्ठ होते हैं। इसलिए भक्तों को कभी भी सर्वोच्च की प्रकृति पर तर्क-वितर्क करने या कृत्रिम रूप से शून्य पर ध्यान करने की सलाह नहीं दी जाती है।
हालाँकि, किसी को यह भूल से नहीं सोचना चाहिए कि इस वर्तमान शरीर के विनाश के बाद कोई शरीर नहीं है जिसके द्वारा कोई भगवान से आमने-सामने जुड़ सके। जीव अजन्मा है। ऐसा नहीं है कि वह भौतिक शरीर के निर्माण के साथ प्रकट होता है। दूसरी ओर, यह सच है कि भौतिक शरीर केवल जीव की इच्छा से विकसित होता है। भौतिक शरीर का विकास जीव की इच्छाओं के कारण होता है। जीव की इच्छाओं के अनुसार, भौतिक शरीर विकसित होता है। इसलिए आत्मा से भौतिक शरीर का अस्तित्व उत्पन्न होता है, जो जीवित शक्ति से उत्पन्न होता है। चूँकि जीव अनादि है, वह शरीर के भीतर की हवा की तरह मौजूद रहता है। हवा शरीर के भीतर और बाहर दोनों जगह है। इसलिए जब बाहरी आवरण, भौतिक शरीर, नष्ट हो जाता है, तो जीवित चिंगारी, शरीर के भीतर की हवा की तरह, मौजूद रहती है। और भगवान के निर्देशन से, क्योंकि वे परम उपकारी हैं, जीव को तुरंत आवश्यक आध्यात्मिक शरीर दिया जाता है जो सारूप्य (समान शारीरिक विशेषता), सलोक्य (भगवान के साथ एक ही ग्रह पर रहने की समान सुविधा), सार्ष्टि (भगवान के समान ऐश्वर्य का समान अधिकार), और सामिप्य (भगवान के साथ समान संगति) के रूप में भगवान से उसके जुड़ाव के अनुकूल होता है।
भगवान इतने दयालु हैं कि यदि भगवान का भक्त भी भक्ति सेवा के पूर्ण पाठ्यक्रम को अखंड और भौतिक संगति से दूषित नहीं कर पाता है, तो उसे अगले जन्म में भक्त या धनवान के परिवार में जन्म देकर एक और मौका दिया जाता है ताकि भौतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष में लगे बिना भक्त अपने अस्तित्व के शेष शुद्धिकरण को समाप्त कर सके और इस प्रकार तुरंत, वर्तमान शरीर को त्यागने के बाद, घर वापस, भगवान के पास जा सके। भगवद-गीता में इसकी पुष्टि की गई है।
इस संबंध में विस्तृत जानकारी श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद के भगवत-संदर्भ में उपलब्ध है। एक बार आध्यात्मिक अस्तित्व प्राप्त करने के बाद, भक्त वहाँ हमेशा के लिए स्थित हो जाता है, जैसा कि पिछले श्लोक में पहले ही चर्चा की जा चुकी है।
