श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  2.7.48 
सध्‌रयङ् नियम्य यतयो यमकर्तहेतिं ।
जह्यु: स्वराडिव निपानखनित्रमिन्द्र: ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
ऐसी दिव्य स्थिति में न तो ज्ञानियों की तरह कृत्रिम रूप से मन पर नियंत्रण करने की, न ही योगियों की तरह ध्यानावस्था में जाने की या कल्पना या चिन्तन की कोई आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य इन विधियों को उसी प्रकार त्याग देता है जिस प्रकार स्वर्ग का राजा इन्द्र कुआँ खोदने का प्रयास नहीं करता।
 
ऐसी दिव्य स्थिति में न तो ज्ञानियों की तरह कृत्रिम रूप से मन पर नियंत्रण करने की, न ही योगियों की तरह ध्यानावस्था में जाने की या कल्पना या चिन्तन की कोई आवश्यकता नहीं होती है। मनुष्य इन विधियों को उसी प्रकार त्याग देता है जिस प्रकार स्वर्ग का राजा इन्द्र कुआँ खोदने का प्रयास नहीं करता।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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