श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  2.7.47 
शश्वत् प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं
शुद्धं समं सदसत: परमात्मतत्त्वम् ।
शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो
माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना
तद् वै पदं भगवत: परमस्य पुंसो
ब्रह्मेति यद् विदुरजस्रसुखं विशोकम् ॥ ४७ ॥
 
 
अनुवाद
परब्रह्म के रूप में अनुभव किया जाने वाला भगवान असीम आनंद से परिपूर्ण हैं और उनके पास कोई दुख नहीं है। यह निश्चित रूप से सर्वोच्च आनंद लेने वाले, भगवान के व्यक्तित्व का अंतिम चरण है। वे शाश्वत रूप से सभी बाधाओं से रहित हैं और निडर हैं। वे पदार्थ नहीं हैं, बल्कि पूर्ण चेतना हैं। वे संदूषण से रहित हैं और उनमें कोई भेद नहीं है। वे सभी कारणों और प्रभावों के मूल कारण हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए कोई यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं है। वे माया से अप्रभावित हैं और उनके सामने माया टिक नहीं पाती।
 
The one who is experienced as the Supreme Brahman is filled with infinite joy without sorrow. This is certainly the final state of the Supreme Enjoyer God. He is eternally free from all obstacles and fearless. He is not matter, but perfect consciousness. He is free from contamination, without distinction and is the root cause of all causes and actions, in whom neither sacrifices have to be made for selfish actions nor does Maya stand before him.
तात्पर्य
परम भोगी, ईश्वर का व्यक्तित्व, सभी कारणों का सर्वोच्च कारण होने कारण वह सर्वोच्च ब्रह्म या सुमुम बोनम है। भ्रमपूर्ण भौतिक अस्तित्व की अवधारणा से उनकी अपनी विशिष्टता के कारण, अवैयक्तिक ब्रह्म साक्षात्कार की परिकल्पना पहला कदम है। दूसरे शब्दों में, अवैयक्तिक ब्रह्म परम तत्व की एक विशेषता है जो भौतिक विविधता से अलग है, ठीक उसी तरह जैसे प्रकाश अपने समकक्ष, अंधकार से अलग एक अवधारणा है। लेकिन प्रकाश की अपनी विविधता होती है, जिसे वे लोग देखते हैं जो प्रकाश में और आगे बढ़ते हैं, और इस तरह ब्रह्म का अंतिम साक्षात्कार ब्रह्म प्रकाश का स्रोत है, ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, सुमुम बोनम या हर चीज़ का परम स्रोत। इसलिए, ईश्वर के व्यक्तित्व से मिलने में अवैयक्तिक ब्रह्म की प्राप्ति भी शामिल है जैसा कि पहले भौतिक भ्रम के विपरीत साक्षात्कार किया गया था। ईश्वर का व्यक्तित्व ब्रह्म साक्षात्कार का तीसरा चरण है जैसा कि प्रथम कांड में समझाया गया है, व्यक्ति को परम तत्व की सभी तीन विशेषताओं - ब्रह्म, परमात्मा और भगवान को समझना चाहिए।

प्रतिबोध-मात्रम भौतिक अस्तित्व की बिल्कुल विपरीत अवधारणा है। पदार्थ में भौतिक कष्ट होते हैं, और इस तरह ब्रह्म की पहली प्राप्ति में ऐसे भौतिक कष्टों का निषेध होता है, और जन्म और मृत्यु, रोग और बुढ़ापे के दर्द से अलग एक शाश्वत अस्तित्व की भावना होती है। वह अवैयक्तिक ब्रह्म की प्राथमिक अवधारणा है।

परम भगवान हर चीज़ की परम आत्मा है, और इसलिए सर्वोच्च अवधारणा में स्नेह की प्राप्ति होती है। स्नेह की अवधारणा आत्मा से आत्मा के संबंध के कारण है। एक पिता अपने बेटे से स्नेह करता है क्योंकि बेटे और पिता के बीच कुछ निकटता का संबंध होता है। लेकिन भौतिक जगत में उस तरह का स्नेह सीमाओं से भरा होता है। जब ईश्वर के व्यक्तित्व से मुलाकात होती है, तो स्नेहपूर्ण संबंध की वास्तविकता के कारण स्नेह की परिपूर्णता प्रकट होती है। वह शरीर और मन की भौतिक रंगतों से स्नेह की वस्तु नहीं है, लेकिन वह सभी जीवित संस्थाओं के लिए स्नेह की पूर्ण, नग्न, दूषित वस्तु है क्योंकि वह सभी के हृदय में परमात्मा है। मुक्ति प्राप्त मामलों की स्थिति में, भगवान के लिए पूर्ण स्नेह जागृत होता है।

इस तरह, यहाँ हमारे द्वारा भौतिक दुनिया में अनुभव किए जाने वाले दुख के विनाश के भय के बिना, अनंत काल तक चलने वाली खुशी का असीमित प्रवाह है। प्रभु से संबंध कभी टूटता नहीं है; इस प्रकार कोई दुःख नहीं है और कोई भय नहीं है। ऐसी खुशी शब्दों से अकथनीय है, और व्यवस्था और बलिदान करके फलदायी गतिविधियों से ऐसी खुशी पैदा करने का कोई प्रयास नहीं हो सकता है। पर हमें यह भी जानना चाहिए कि इस छंद में वर्णित परम व्यक्तित्व ईश्वर के साथ अटूट सुख, उपनिषदों की अवैयक्तिक अवधारणा को पार करता है। उपनिषदों में विवरण चीजों की भौतिक अवधारणा का कम या ज्यादा नकार है, लेकिन यह सर्वोच्च भगवान की पारलौकिक इंद्रियों से इनकार नहीं है। यहाँ भी वही कथन में पुष्टि की गई है कि सर्वोच्च भगवान शुद्ध हैं (शुद्धम)। शुद्धम शब्द इंगित करता है कि ईश्वरत्व के व्यक्तित्व की इंद्रियाँ भौतिक तत्वों से नहीं बनी हैं; वे सभी पारलौकिक हैं, भौतिक पहचान के सभी संदूषण से मुक्त हैं। और मुक्त आत्माएँ भी इंद्रियों से रहित नहीं होतीं; अन्यथा उनके बीच सहज अखंड आनंद में आदान-प्रदान की गई अबाधित आध्यात्मिक खुशी की कोई प्रतिशोध नहीं हो सकता है। भगवान और भक्तों दोनों की सभी इंद्रियाँ भौतिक संदूषण के बिना हैं। वे इसलिए हैं क्योंकि वे भौतिक कारण और प्रभावों से परे हैं, जैसा कि यहाँ स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है (सद-असातः परम)। भगवान और उनके पारलौकिक भक्तों के सामने शर्मिंदा होने के कारण भ्रामक, भौतिक ऊर्जा वहाँ काम नहीं कर सकती। भौतिक दुनिया में इंद्रिय गतिविधियाँ दुःख के बिना नहीं होती हैं, पर यहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवान और भक्तों की इंद्रियाँ बिना किसी दुःख के हैं। भौतिक और आध्यात्मिक इंद्रियों के बीच एक अलग अंतर है। और भौतिक अवधारणा के कारण आध्यात्मिक इंद्रियों को नकारे बिना इसे समझना चाहिए। भौतिक दुनिया में इंद्रियाँ भौतिक अज्ञान से अभिभूत हैं। हर तरह से, अधिकारियों ने भौतिक अवधारणा से इंद्रियों को शुद्ध करने की सिफारिश की है। भौतिक दुनिया में इंद्रियों को व्यक्तिगत और व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए हेरफेर किया जाता है, जबकि आध्यात्मिक दुनिया में इंद्रियों का ठीक से उपयोग उस उद्देश्य के लिए किया जाता है जिसके लिए वे मूल रूप से अभिप्रेत थे, अर्थात् सर्वोच्च भगवान की संतुष्टि। ऐसी कामुक गतिविधियाँ प्राकृतिक हैं, और इसलिए इंद्रिय संतुष्टि वहाँ निर्बाध और भौतिक संदूषण से अखंड है क्योंकि इंद्रियाँ आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होती हैं। और इंद्रियों की ऐसी संतुष्टि पारलौकिक प्रतिशोध द्वारा समान रूप से साझा की जाती है। चूंकि गतिविधियाँ असीमित हैं और लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए भौतिक प्रयासों या कृत्रिम व्यवस्थाओं की कोई गुंजाइश नहीं है। पारलौकिक गुणवत्ता की ऐसी खुशी को ब्रह्म-सौख्यम् कहा जाता है, जिसका स्पष्ट रूप से वर्णन पांचवें कैंटो में किया जाएगा।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)