श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  2.7.40 
विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह
य: पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि ।
चस्कम्भ य: स्वरहसास्खलता त्रिपृष्ठं
यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरुकम्पयानम् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
भला कौन है जो भगवान विष्णु की महिमा का पूरा वर्णन कर सके? वह वैज्ञानिक भी नहीं कर सकता जिसने ब्रह्माण्ड के परमाणुओं के कणों की गिनती की है। क्योंकि वही एकमात्र हैं जिन्होंने त्रिविक्रम के रूप में अपने पैर को बिना किसी प्रयास के सर्वोच्च ग्रह, सत्यलोक, से भी आगे प्रकृति के तीन गुणों की साम्यावस्था तक बढ़ाया था, और तब पूरा ब्रह्मांड हिल गया था।
 
भला कौन है जो भगवान विष्णु की महिमा का पूरा वर्णन कर सके? वह वैज्ञानिक भी नहीं कर सकता जिसने ब्रह्माण्ड के परमाणुओं के कणों की गिनती की है। क्योंकि वही एकमात्र हैं जिन्होंने त्रिविक्रम के रूप में अपने पैर को बिना किसी प्रयास के सर्वोच्च ग्रह, सत्यलोक, से भी आगे प्रकृति के तीन गुणों की साम्यावस्था तक बढ़ाया था, और तब पूरा ब्रह्मांड हिल गया था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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