श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  2.7.37 
देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां
पूर्भिर्मयेन विहिताभिरद‍ृश्यतूर्भि: ।
लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं
वेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम् ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
जब नास्तिक वैदिक विज्ञान में महारत हासिल कर लेंगे और महान वैज्ञानिक मय द्वारा निर्मित उत्तम रॉकेटों में चढ़कर, आकाश में अदृश्य होकर अलग-अलग ग्रहों के निवासियों का संहार करेंगे, तब भगवान बुद्ध के रूप में बेहद आकर्षक वेश धारण कर उनके दिमाग को मोह लेंगे और उन्हें उपधर्मों का उपदेश देंगे।
 
When the atheists, having become proficient in Vedic science, will fly invisible in the sky riding the best missiles made by the supreme scientist Maya and kill the inhabitants of the various worlds, then the Lord, assuming a very attractive guise as Buddha will captivate their minds and will preach the sub-religions to them.
तात्पर्य
भगवान बुद्ध का यह अवतार वर्तमान मानव इतिहास में हमारे लिए बुद्ध का अवतार नहीं है। श्रीला जीव गोस्वामी के अनुसार, इस श्लोक में वर्णित बुद्ध अवतार एक अलग कलि युग में प्रकट हुआ था। एक मनु के जीवन काल में सत्तर-दो से अधिक कलि-युग होते हैं और उनमें से एक में यहाँ वर्णित विशिष्ट प्रकार का बुद्ध प्रकट होगा। भगवान बुद्ध उस समय अवतरित होते हैं जब लोग सबसे भौतिकवादी होते हैं और सामान्य धार्मिक सिद्धांतों का प्रचार करते हैं। इस तरह की अहिंसा अपने आप में एक धार्मिक सिद्धांत नहीं है, लेकिन यह उन लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण गुण है जो वास्तव में धार्मिक हैं। यह एक सामान्य धर्म है क्योंकि किसी को किसी अन्य जानवर या जीवित प्राणी को कोई नुकसान न करने की सलाह दी जाती है क्योंकि इस तरह की हानिकारक क्रियाएं उसे भी समान रूप से हानिकारक होती हैं जो नुकसान करता है। लेकिन अहिंसा के इन सिद्धांतों को सीखने से पहले किसी को दो अन्य सिद्धांत सीखने होते हैं, अर्थात् विनम्र होना और अभिमानहीन होना। जब तक कोई विनम्र और अभिमानहीन नहीं होता है, वह हानिरहित और अहिंसक नहीं हो सकता है। और अहिंसक होने के बाद उसे जीवन की सहनशीलता और सादगी सीखनी होगी। किसी को महान धार्मिक प्रचारकों और आध्यात्मिक गुरुओं का सम्मान करना चाहिए और नियंत्रित क्रिया के लिए इंद्रियों को प्रशिक्षित करना चाहिए, परिवार और घर से अनासक्त होना सीखना चाहिए और भगवान की भक्ति सेवा करना आदि। अंतिम चरण में किसी को भगवान को स्वीकार करना होगा और उसका भक्त बनना होगा; अन्यथा कोई धर्म नहीं है। धार्मिक सिद्धांतों में केंद्र में ईश्वर होना चाहिए; अन्यथा सरल नैतिक निर्देश केवल अधार्मिक सिद्धांत हैं, जिन्हें आमतौर पर उपधर्म या धार्मिक सिद्धांतों के निकट माना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)