कालेन मीलितधियामवमृश्य नृणां
स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपार: ।
आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां
वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६ ॥
अनुवाद
व्यासदेव के रूप में स्वयं भगवान अवतार लेकर वैदिक साहित्य के संग्रह को कठिन समझकर, युग की परिस्थितियों के अनुसार वैदिक ज्ञानरूपी वृक्ष को शाखाओं में विभाजित कर देंगे, क्योंकि यह ज्ञान अल्पजीवी और अल्पज्ञ लोगों के लिए कठिन है।
By incarnated as Satyavati's son (Vyasdev), God Himself, considering the collection of Vedic literature difficult for the short-lived ignorant people, will divide the tree of Vedic knowledge into branches according to the circumstances of the particular era.
तात्पर्य
हिस्से में ब्रह्मा कली युग के अल्पकालिक जीवों के लिए श्रीमद्-भागवतम के भावी संग्रह का उल्लेख करते हैं। जैसा कि पहले कांड में वर्णित है कि कली युग के कम बुद्धि वाले व्यक्ति न केवल अल्पकालिक होंगे, बल्कि ईश्वरीय मानव समाज की दयनीय स्थिति के कारण जीवन की कई समस्याओं से भी हैरान रहेंगे। भौतिक प्रकृति के नियमों के अनुसार शरीर में भौतिक सुख का विकास अज्ञानता के तरीके में गतिविधि है। ज्ञान का वास्तविक विकास आत्म-साक्षात्कार में ज्ञान की प्रगति है। लेकिन कली युग में कम बुद्धि वाले पुरुष गलती से सौ वर्ष के छोटे जीवनकाल को (जो अब वास्तव में लगभग चालीस या साठ वर्ष तक कम हो गया है) सभी में सभी मानते हैं। वे कम बुद्धि वाले हैं क्योंकि उनके पास जीवन की अनंतता की कोई जानकारी नहीं है; वे चालीस साल तक मौजूद अस्थायी भौतिक शरीर के साथ पहचान करते हैं और इसे जीवन का एकमात्र मूल सिद्धांत मानते हैं। ऐसे व्यक्तियों को गधे और बैल के समान वर्णित किया गया है। लेकिन प्रभु, सभी जीवों के दयालु पिता के रूप में, उन्हें भगवद-गीता और स्नातकों के लिए श्रीमद्-भागवत जैसे संक्षिप्त ग्रंथों में विशाल वैदिक ज्ञान प्रदान करते हैं। पुराण और महाभारत भी इसी तरह से व्यासदेव द्वारा भौतिक प्रकृति के तरीकों में विभिन्न प्रकार के पुरुषों के लिए बनाए गए हैं। लेकिन उनमें से कोई भी वैदिक सिद्धांतों से स्वतंत्र नहीं है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥