श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 34-35
 
 
श्लोक  2.7.34-35 
ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट-
मल्लेभकंसयवना: कपिपौण्ड्रकाद्या: ।
अन्ये च शाल्वकुजबल्वलदन्तवक्र-
सप्तोक्षशम्बरविदूरथरुक्‍मिमुख्या: ॥ ३४ ॥
ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापा:
काम्बोजमत्स्यकुरुसृञ्जयकैकयाद्या: ।
यास्यन्त्यदर्शनमलं बलपार्थभीम-
व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रलंब, धेनुक, बक, केशी, अरिष्ट, चाणूर, मुष्टिक, कुवलयापीड़ हाथी, कंस, यवन, नरकासुर और पौंड्रक जैसे सभी राक्षसीय व्यक्तित्व, शाल्व, द्विविद वानर और बलवल, दंतवक्र, सात सांड, शंभर, विदूराथ और रुक्मी जैसे महान सैन्य प्रमुखों के रूप में, काम्बोज, मत्स्य, कुरु, सृंजय और केकय जैसे महान योद्धा, हरि के साथ या बलदेव, अर्जुन, भीम आदि के नामों के तहत उनके साथ ज़ोरदार लड़ाई लड़ेंगे। और इस प्रकार से मारे गए राक्षस या तो निर्विशेष ब्रह्मज्योति को प्राप्त करेंगे या वैकुण्ठ ग्रहों में उनके निजी निवास को प्राप्त करेंगे।
 
Pralamba, Dhenuka, Bak, Keshi, Arishta, Chanur, Mushtik, Kuvalayapid elephants, demons like Kansa, Yavana, Narakasura and Paundrak, Shalva, Dwivid monkeys and commanders like Balwal, Dantavakra, seven bulls, Shambar, Viduratha and Rukmi and brave warriors like Kamboja, Matsya, Kuru, Srinjay and Kekaya, There will be a fierce battle with Hari or with the Lord Himself in the guise of the names Baldev, Arjun, Bhima etc. and all the demons killed in this way will either attain the impersonal Brahmajyoti or will attain the abode of God situated in the Vaikuntha world.
तात्पर्य
भौतिक और आध्यात्मिक दोनों लोकों में सभी प्रकटीकरण भगवान कृष्ण की विभिन्न शक्तियों के प्रदर्शन हैं। भगवान बलदेव उनके प्रत्यक्ष व्यक्तिगत विस्तार हैं, और भीम, अर्जुन आदि उनके व्यक्तिगत सहयोगी हैं। भगवान अपने सभी सहयोगियों और शक्तियों के साथ प्रकट होंगे (और जब भी प्रकट होते हैं तो ऐसा ही करते हैं)। इसलिए, प्रलंब जैसे नामों से बताए गए दानव और दानवीय पुरुषों जैसी विद्रोही आत्माओं को या तो स्वयं भगवान द्वारा या उनके सहयोगियों द्वारा मारा जाएगा। इन सभी मामलों को दसवें खंड में स्पष्ट रूप से समझाया जाएगा। परंतु हमें अच्छी तरह से जानना चाहिए कि ऊपर उल्लेखित सभी जीवों को मार दिया जाएगा, चाहे भगवान के ब्रह्मज्योति में विलीन होने या भगवान के वैकुंठ नामक निवास में प्रवेश करने की अनुमति देकर मोक्ष प्राप्त होगा। यह पहले ही भीष्मदेव (प्रथम खंड) द्वारा समझाया जा चुका है। वे सभी व्यक्ति जिन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में या अन्यथा भगवान या बलदेव आदि के साथ भाग लिया था, मृत्यु के समय अपने मन की स्थिति के अनुसार आध्यात्मिक अस्तित्व प्राप्त करने से लाभान्वित होंगे। जो लोग भगवान को पहचानेंगे वे वैकुंठ में प्रवेश करेंगे, और जो लोग भगवान को केवल एक शक्तिशाली प्राणी के रूप में मानेंगे वे भगवान के अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति के आध्यात्मिक अस्तित्व में विलीन होकर मोक्ष प्राप्त करेंगे। लेकिन उनमें से हर एक को भौतिक अस्तित्व से मुक्ति मिलेगी। चूंकि उन लोगों का यही लाभ है जो भगवान के साथ शत्रुतापूर्ण ढंग से खेले, कोई अंदाजा लगा सकता है कि उन लोगों की क्या स्थिति होगी जिन्होंने भगवान की भक्ति उनके साथ पारलौकिक संबंध में की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)