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श्लोक 2.7.33  |
क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां
रासोन्मुख: कलपदायतमूर्च्छितेन ।
उद्दीपितस्मररुजां व्रजभृद्वधूनां
हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| जब भगवान व्रजवासियों की पत्नियों में अपने मधुर और सुरीले गीतों से कामदेव को जगाते हुए व्रजभूमि में रासलीला में मग्न थे, तभी कुबेर के एक धनवान अनुचर शंखचूड़ नामक राक्षस ने गोपियों का हरण कर लिया। तब भगवान ने उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। |
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| जब भगवान व्रजवासियों की पत्नियों में अपने मधुर और सुरीले गीतों से कामदेव को जगाते हुए व्रजभूमि में रासलीला में मग्न थे, तभी कुबेर के एक धनवान अनुचर शंखचूड़ नामक राक्षस ने गोपियों का हरण कर लिया। तब भगवान ने उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। |
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