गृह्णीत यद् यदुपबन्धममुष्य माता
शुल्बं सुतस्य न तु तत् तदमुष्य माति ।
यज्जृम्भतोऽस्य वदने भुवनानि गोपी
संवीक्ष्य शङ्कितमना: प्रतिबोधितासीत् ॥ ३० ॥
अनुवाद
जब गोपी (कृष्ण की धात्री माता यशोदा) अपने पुत्र के हाथों को रस्सी से बाँधने की कोशिश कर रही थी तो उसने देखा कि रस्सी हमेशा छोटी पड़ जाती थी। जब उसने हार मान ली और कोशिश करना बंद कर दिया, तब कृष्ण ने अपना मुँह खोल दिया और यशोदा ने उसके मुँह में सारे ब्रह्माण्डों को देखा। यह देखकर उसे संदेह हुआ, लेकिन उसने एक अलग तरीके से अपने पुत्र की दिव्य शक्ति को जाना।
When Gopi (Krishna's foster mother Yashoda) was trying to tie her son's both hands with ropes, she noticed that the rope was always too short. So, when she gave up and stopped trying, then Shri Krishna opened his mouth and mother Yashoda saw the entire universe inside his mouth. Seeing this, she became suspicious, but she came to know about her son's yogic powers in a different way.
तात्पर्य
एक दिन शरारती बच्चे के रूप में भगवान कृष्ण ने अपनी माँ यशोदा को बहुत परेशान किया, और उसने सज़ा देने के लिए उन्हें रस्सियों से बांधना शुरू कर दिया। लेकिन चाहे कितनी भी रस्सी का प्रयोग किया हो, वह हमेशा अपर्याप्त पाई गईं। इस तरह वह थक गईं, पर इस बीच भगवान ने अपना मुंह खोला और स्नेही माँ ने अपने बेटे के मुंह में सभी ब्रम्हांडों को एक साथ देखा। माँ को आश्चर्य हुआ, पर कृष्ण के लिए अपने गहरे स्नेह के कारण उन्होंने सोचा कि सर्वशक्तिमान ईश्वर नारायण ने उनके बेटे की तरफ दयालुता से देखा ताकि उसे लगातार हो रही दुर्घटनाओं से बचाया जा सके। कृष्ण के लिए अपने गहरे स्नेह के कारण, वह कभी यह नहीं सोच पाईं कि उनका बेटा स्वयं नारायण है, स्वयं ईश्वर का व्यक्तित्व। यह योग-माया की क्रिया है, जो सर्वोच्च भगवान की आंतरिक शक्ति है, जो भगवान के विभिन्न प्रकार के भक्तों के साथ उनकी सभी लीलाओं को संपूर्ण करने के लिए काम करती है। भगवान होने के बिना ऐसा अद्भुत कार्य कौन कर सकता है?
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥