श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  2.7.3 
जज्ञे च कर्दमगृहे द्विज देवहूत्यां
स्त्रीभि: समं नवभिरात्मगतिं स्वमात्रे ।
ऊचे ययात्मशमलं गुणसङ्गपङ्क-
मस्मिन् विधूय कपिलस्य गतिं प्रपेदे ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद भगवान कपिल अवतार रूप में प्रकट हुए और प्रजापति ब्राह्मण कर्दम और उनकी पत्नी देवहूति के पुत्र के रूप में नौ अन्य स्त्रियों (बहनों) के साथ जन्म लिया। उन्होंने अपनी माता को आत्म-बोध के विषय में उपदेश दिया, जिसके द्वारा वे उसी जीवनकाल में भौतिक प्रकृति के गुणों से निर्मल हुईं और उन्होंने मुक्ति प्राप्त की, जो कपिल का मार्ग है।
 
Thereafter the Lord incarnated as Kapila and was born as the son of Prajapati Brahmana Kardama and his wife Devahuti along with nine other sisters. He taught his mother about self-realization, by which she became pure from the mud of worldly qualities in the same lifetime and attained liberation which is the path of Kapila.
तात्पर्य
भगवान् कपिल द्वारा अपनी माता देवहूति को दिये गये उपदेश श्रीमद्-भागवतम के तृतीय स्कन्ध (अध्याय 25-32) में पूर्ण रूप से वर्णित हैं, और जो भी उन उपदेशों का पालन करता है वह वही मुक्ति प्राप्त कर सकता है जो देवहूति को मिली थी। भगवान् ने भागवत-गीता का उद्घोष किया, और इससे अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति हुई, और आज भी जो भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है वह भी श्री अर्जुन के समान ही लाभ प्राप्त कर सकता है। शास्त्रों का उद्देश्य यही है। मूर्ख, अज्ञानी व्यक्ति अपनी स्वयं की कल्पना से व्याख्याएँ देते हैं और इस प्रकार अपने अनुयायियों को भ्रमित करते हैं, जिससे वे भौतिक अस्तित्व के कालकोठरी में बने रहते हैं। हालाँकि, आज भी केवल भगवान् कृष्ण या भगवान् कपिल द्वारा दिये गये उपदेशों का पालन करने से ही व्यक्ति सर्वोच्च लाभ प्राप्त कर सकता है। पूर्ण ज्ञान के संदर्भ में आत्म-गति शब्द महत्त्वपूर्ण है। भगवान् और जीव की गुणात्मक समानता को जानकर ही संतुष्ट नहीं होना चाहिए। व्यक्ति को भगवान् को उतना जानना चाहिए जितना कि हमारे सीमित ज्ञान द्वारा जाना जा सकता है। भगवान् को पूर्ण रूप से जानना असंभव है जैसा कि वे हैं, यहाँ तक कि शिव या ब्रह्मा जैसे मुक्त व्यक्तियों के लिए भी, तो इस दुनिया में अन्य देवताओं या मनुष्यों की तो बात ही क्या। फिर भी, महान भक्तों के सिद्धांतों और शास्त्रों में उपलब्ध उपदेशों का पालन करने से व्यक्ति भगवान् की विशेषताओं को काफी हद तक जान सकता है। भगवान् के अवतार, उनकी महिमा कपिल ने अपनी माता को भगवान् के व्यक्तित्व रूप के बारे में पूरी तरह से निर्देश दिया, और इस तरह वह भगवान् के व्यक्तित्व रूप को जान पायीं और वैकुण्ठलोक में एक स्थान प्राप्त करने में सक्षम हुईं जहाँ भगवान् कपिल प्रबल हैं। भगवान् के हर अवतार का आध्यात्मिक आकाश में अपना निवास स्थान है। इसलिए भगवान् कपिल का भी अपना अलग वैकुण्ठ ग्रह है। आध्यात्मिक आकाश शून्य नहीं है। असंख्य वैकुण्ठ ग्रह हैं, और उनमें से प्रत्येक में भगवान् अपने असंख्य विस्तारों के द्वारा प्रबल हैं, और वहाँ रहने वाले शुद्ध भक्त भी भगवान् और उनके शाश्वत सहयोगियों के समान ही शैली में रहते हैं। जब भगवान् व्यक्तिगत रूप से या अपने व्यक्तिगत पूर्ण विस्तारों से अवतरित होते हैं, तो ऐसे अवतार अंश, कला, गुण, युग और मन्वंतर अवतार कहलाते हैं, और जब भगवान् के सहयोगी भगवान् के आदेश से अवतरित होते हैं, ऐसे अवतार शक्त्यवेश अवतार कहलाते हैं। लेकिन सभी मामलों में सभी अवतार अधिकृत शास्त्रों के अविनाशी कथनों द्वारा समर्थित हैं, न कि किसी स्वार्थी प्रचारक की कल्पना द्वारा। उपरोक्त श्रेणियों में से किसी में भी भगवान् के ऐसे अवतार हमेशा सर्वोच्च भगवान् को ही परम सत्य घोषित करते हैं। परम सत्य की अवैयक्तिक अवधारणा परम सत्य की सांसारिक अवधारणा से भगवान् के रूप के निषेध की एक प्रक्रिया मात्र है। जीव, अपने स्वयं के संविधान द्वारा, भगवान् के समान ही आध्यात्मिक रूप से अच्छे हैं, और उनमें अंतर केवल इतना है कि भगवान् हमेशा सर्वोच्च और शुद्ध हैं, भौतिक प्रकृति के गुणों द्वारा दूषित हुए बिना, जबकि जीव भलाई, जुनून और अज्ञानता के भौतिक गुणों के साथ जुड़ने से दूषित होने के योग्य हैं। भौतिक गुणों द्वारा इस संदूषण को ज्ञान, त्याग और भक्ति सेवा द्वारा पूरी तरह से धोया जा सकता है। भगवान् के लिए भक्ति सेवा अंतिम मुद्दा है, और इसलिए जो लोग भगवान् की भक्ति सेवा में सीधे तौर पर लगे हुए हैं, वे न केवल आध्यात्मिक विज्ञान में आवश्यक ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि भौतिक संबंध से भी अलग हो जाते हैं और इस प्रकार भागवत-गीता (14.26) में बताए अनुसार, पूर्ण मुक्ति द्वारा ईश्वर के राज्य में पहुँच जाते हैं:

मां च योऽव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान् समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

गैरमुक्त अवस्था में भी जीवात्मा परमेश्वर कृष्ण या उनके पूर्ण विस्तार जैसे राम तथा नरसिंह की पारलौकिक प्रेममयी सेवा में सीधे तौर पर संलग्न हो सकता है। इस प्रकार ऐसी पारलौकिक भक्तिमयी सेवा के समानुपातिक सुधार के साथ भक्त निश्चित रूप से ब्रह्म-गति या आत्म-गति की ओर बढ़ता है और अंततः कपाल की गत्य प्राप्त कर लेता है या बिना किसी कठिनाई के प्रभु के निवास स्थान को प्राप्त करता है। प्रभु की भक्तिमयी सेवा की रोगाणुरोधी शक्ति इतनी महान है कि भक्त के वर्तमान जीवन में भी यह भौतिक संक्रमण को समाप्त कर सकती है। भक्त को पूर्ण मुक्ति के लिए अपने अगले जन्म की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)