श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  2.7.29 
तत् कर्म दिव्यमिव यन्निशि नि:शयानं
दावाग्निना शुचिवने परिदह्यमाने ।
उन्नेष्यति व्रजमतोऽवसितान्तकालं
नेत्रे पिधाप्य सबलोऽनधिगम्यवीर्य: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
कालिय नाग को सजा देने के उसी दिन की रात जब ब्रजवासी सारी चिंता त्यागकर सोए हुए थे, जंगल में सूखे पत्तों के कारण आग लग गई और ऐसा लगा मानो सभी ब्रजवासियों की मृत्यु होना तय है। किंतु भगवान ने बलराम के साथ आँखें बंद करके उन सब को बचा लिया। भगवान के चमत्कार ऐसे ही होते हैं!
 
कालिय नाग को सजा देने के उसी दिन की रात जब ब्रजवासी सारी चिंता त्यागकर सोए हुए थे, जंगल में सूखे पत्तों के कारण आग लग गई और ऐसा लगा मानो सभी ब्रजवासियों की मृत्यु होना तय है। किंतु भगवान ने बलराम के साथ आँखें बंद करके उन सब को बचा लिया। भगवान के चमत्कार ऐसे ही होते हैं!
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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