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श्लोक 2.7.27  |
तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकाया-
स्त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्त: ।
यद् रिङ्गतान्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा
उन्मूलनं त्वितरथार्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान श्रीकृष्ण के परमेश्वर होने में कोई सन्देह नहीं है, क्योंकि जब वे अपनी माता की गोद में थे तब पूतना जैसी राक्षसी का वध कर सकते थे; तीन महीने की आयु में अपने पाँव से बैलगाड़ी को पलट सकते थे; और जब घुटने के बल चल रहे थे तभी आसमान को छूते हुए दो अर्जुन वृक्षों को उखाड़ सकते थे। ये सभी कार्य स्वयं भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए करना असंभव है। |
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| भगवान श्रीकृष्ण के परमेश्वर होने में कोई सन्देह नहीं है, क्योंकि जब वे अपनी माता की गोद में थे तब पूतना जैसी राक्षसी का वध कर सकते थे; तीन महीने की आयु में अपने पाँव से बैलगाड़ी को पलट सकते थे; और जब घुटने के बल चल रहे थे तभी आसमान को छूते हुए दो अर्जुन वृक्षों को उखाड़ सकते थे। ये सभी कार्य स्वयं भगवान के अतिरिक्त अन्य किसी के लिए करना असंभव है। |
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