श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  2.7.25 
वक्ष:स्थलस्पर्शरुग्नमहेन्द्रवाह-
दन्तैर्विडम्बितककुब्जुष ऊढहासम् ।
सद्योऽसुभि: सह विनेष्यति दारहर्तु-
र्विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरतोऽधिसैन्ये ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जब रावण युद्ध में तल्लीन था, तो स्वर्ग के राजा इन्द्र के हाथी की सूँड़ उसकी छाती से टकराकर टुकड़े-टुकड़े हो गयी और ये टुकड़े बिखरकर चारों दिशाओं को प्रकाशित करने लगे। इसलिए रावण को अपने शौर्य और पराक्रम पर गर्व होने लगा और उसने अपने आपको समस्त दिशाओं का विजेता समझ लिया और सैनिकों के बीच इतराने लगा। परन्तु भगवान श्री रामचन्द्र द्वारा अपने धनुष की टंकार करते ही उसकी प्रसन्नता की हँसी और उसके साथ ही उसकी जीवनवयु भी सहसा समाप्त हो गई।
 
When Ravana was fighting, the trunk of the elephant of the King of Heaven Indra broke into pieces after hitting his chest and these pieces scattered and started dazzling all the four directions. Therefore Ravana became proud of his bravery and started strutting among his soldiers thinking himself to be the conqueror of all directions. But when Lord Shri Ramchandra twirled his bow, his laughter of joy suddenly stopped along with his breath.
तात्पर्य
एक जीव चाहे जितना भी बलवान हो जब परमात्मा उसको त्याग देता है, तो उसको कोई भी नहीं बचा सकता, इसी प्रकार कोई भी जीव चाहे जितना भी निर्बल हो अगर भगवान उसकी रक्षा कर रहे हैं तो उसका विनाश कोई नहीं कर सकता।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)