जैसा कि भगवद-गीता (4.7) में कहा गया है, भगवान तब प्रकट होते हैं जब वास्तविक धर्म के निर्वहन में विसंगतियाँ होती हैं। भगवान रामचंद्र भी इसी परिस्थिति में प्रकट हुए, उनके भाईयों के साथ, जो भगवान की आंतरिक शक्ति के विस्तार हैं, और लक्ष्मीजी सीतादेवी के साथ।
भगवान रामचंद्र को उनके पिता, महाराज दशरथ ने अजीब परिस्थितियों में जंगल के लिए घर छोड़ने का आदेश दिया था, और भगवान ने, अपने पिता के आदर्श पुत्र के रूप में, आदेश को पूरा किया, यहाँ तक कि अयोध्या के राजा घोषित होने के अवसर पर भी। उनके एक छोटे भाई, लक्ष्मणजी ने उनके साथ जाने की इच्छा की, और इसलिए उनकी शाश्वत पत्नी, सीताजी ने भी उनके साथ जाने की इच्छा की। भगवान उन दोनों से सहमत हुए, और सभी ने एक साथ दंडकारण्य वन में प्रवेश किया, वहाँ चौदह वर्षों तक रहने के लिए। जंगल में रहने के दौरान, रामचंद्र और रावण के बीच कुछ झगड़ा हुआ, और बाद वाले ने भगवान की पत्नी, सीता का अपहरण कर लिया। झगड़ा महान शक्तिशाली रावण के साथ-साथ उसके पूरे राज्य और परिवार की विजय के साथ समाप्त हो गया।
सीता लक्ष्मीजी या भाग्य की देवी हैं, लेकिन वह किसी भी जीवित प्राणी द्वारा कभी भी आनंद नहीं उठाई जाती हैं। वह अपने पति, श्री रामचंद्र के साथ जीवित प्राणी द्वारा पूजे जाने के लिए बनी हैं। रावण जैसा भौतिकवादी व्यक्ति इस महान सत्य को नहीं समझता है, बल्कि इसके विपरीत वह सीतादेवी को राम की हिरासत से छीनना चाहता है और इस तरह बड़ी दुर्दशा करता है। भौतिकवादी, जो वैभव और भौतिक समृद्धि के पीछे हैं, रामायण से सबक ले सकते हैं कि सर्वोच्च भगवान की सर्वोच्चता को स्वीकार किए बिना भगवान की प्रकृति का दोहन करने की नीति रावण की नीति है। रावण भौतिक रूप से बहुत उन्नत था, इतना अधिक कि उसने अपने राज्य, लंका को, शुद्ध सोने में, या पूर्ण भौतिक धन में बदल दिया। लेकिन क्योंकि उसने भगवान रामचंद्र की सर्वोच्चता को नहीं पहचाना और अपनी पत्नी सीता को चुराकर उसे चुनौती दी, रावण मारा गया, और उसकी सारी संपत्ति और शक्ति नष्ट हो गई।
भगवान रामचंद्र छह ऐश्वर्य के साथ एक पूर्ण अवतार हैं, और इसलिए इस श्लोक में उन्हें क्लेशः या सभी ऐश्वर्य के स्वामी के रूप में उल्लेख किया गया है।
