श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  2.7.18 
नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौच-
माप: शिखाधृतवतो विबुधाधिपत्यम् ।
यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्य-
दात्मानमङ्ग मनसा हरयेऽभिमेने ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
प्रभु के चरण कमलों से धोए गए जल को अपने मस्तक पर धारण करने वाले बलि महाराज ने गुरु द्वारा मना किए जाने पर भी मन में वचन के अतिरिक्त कुछ नहीं रखा। राजा ने प्रभु के तीसरे पग को पूरा करने हेतु अपना शरीर निछावर कर दिया। ऐसे महापुरुष के लिए उनके पराक्रम से जीते गये स्वर्ग लोक के साम्राज्य का भी कोई मूल्य नहीं था।
 
प्रभु के चरण कमलों से धोए गए जल को अपने मस्तक पर धारण करने वाले बलि महाराज ने गुरु द्वारा मना किए जाने पर भी मन में वचन के अतिरिक्त कुछ नहीं रखा। राजा ने प्रभु के तीसरे पग को पूरा करने हेतु अपना शरीर निछावर कर दिया। ऐसे महापुरुष के लिए उनके पराक्रम से जीते गये स्वर्ग लोक के साम्राज्य का भी कोई मूल्य नहीं था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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