|
| |
| |
श्लोक 2.7.16  |
श्रुत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेय-
श्चक्रायुध: पतगराजभुजाधिरूढ: ।
चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मा-
द्धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार ॥ १६ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हाथी की पुकार सुनकर श्रीभगवान को लगा कि उसे उनकी तुरंत मदद की जरूरत है क्योंकि वो बहुत संकट में था। इसलिए भगवान पक्षिराज गरुड़ के पंखों पर सवार होकर अपने आयुध चक्र से सज्जित होकर वहाँ पहुँचे। उन्होंने अपने चक्र से मगर के मुँह को टुकड़े-टुकड़े कर दिया ताकि हाथी की रक्षा हो सके और फिर उसकी सूँड़ पकड़कर उसे बाहर निकाल लिया। |
| |
| हाथी की पुकार सुनकर श्रीभगवान को लगा कि उसे उनकी तुरंत मदद की जरूरत है क्योंकि वो बहुत संकट में था। इसलिए भगवान पक्षिराज गरुड़ के पंखों पर सवार होकर अपने आयुध चक्र से सज्जित होकर वहाँ पहुँचे। उन्होंने अपने चक्र से मगर के मुँह को टुकड़े-टुकड़े कर दिया ताकि हाथी की रक्षा हो सके और फिर उसकी सूँड़ पकड़कर उसे बाहर निकाल लिया। |
|
|
| ✨ ai-generated |
| |
|