श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 7: विशिष्ट कार्यों के लिए निर्दिष्ट अवतार  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.7.15 
अन्त:सरस्युरुबलेन पदे गृहीतो
ग्राहेण यूथपतिरम्बुजहस्त आर्त: ।
आहेदमादिपुरुषाखिललोकनाथ
तीर्थश्रव: श्रवणमङ्गलनामधेय ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
नदी के भीतर अत्यंत बलशाली मगर द्वारा पैर पकड़े जाने से हाथियों का नेता बहुत पीड़ित था। उसने अपनी सूंड में कमल का फूल लेकर भगवान से कहा, "हे आदि भोक्ता, ब्रह्मांड के स्वामी, हे उद्धारक, हे तीर्थ के समान विख्यात, आपका पवित्र नाम जपे जाने योग्य है। इसके श्रवण मात्र से ही सभी लोग पवित्र हो जाते हैं।"
 
The leader of the elephants, greatly distressed at having been caught by a mighty crocodile in the river, took a lotus flower in his trunk and addressed the Lord thus: "O original enjoyer, O Lord of the universe, O redeemer, O renowned like a pilgrimage place, Your holy names, which are worthy of being chanted, purify all persons by merely hearing them."
तात्पर्य
हाथियों के सरदार को मुक्ति दिलाने की कथा जिसके पिंडली पर नदी में मगरमच्छ ने हमला किया था, उसका वर्णन श्रीमद्-भागवतम के आठवें कांड में है। चूँकि प्रभु पूर्ण ज्ञान है, इस लिए उनके पवित्र नाम और भगवान के दिव्य व्यक्तित्व में कोई भी अंतर नहीं है। जब मगरमच्छ ने उस पर हमला किया, तो हाथियों के सरदार ने बहुत कष्ट झेला। यद्यपि हाथी हमेशा मगरमच्छ से अधिक शक्तिशाली होते हैं, पर जब हाथी पानी में होता है, तब मगरमच्छ अधिक शक्तिशाली हो जाता है। और क्योंकि हाथी अपने पिछले जन्म में भगवान का एक महान भक्त था, वह अपने पिछले अच्छे कर्मों की बदौलत भगवान के पवित्र नाम का जाप करने में सक्षम था। हर जीव इस भौतिक संसार में हमेशा ही व्यथित रहता है क्योंकि यहाँ हर कदम पर किसी प्रकार का कष्ट झेलना ही पड़ता है। लेकिन जो अपने पिछले अच्छे कर्मों से सहारा पाता है वह स्वयं को भगवान की भक्ति में लगा देता है, जैसा कि भगवद् गीता (7.16) में पुष्टि की गयी है। जो अधर्मी कर्मों द्वारा समर्थित होते हैं, वे भगवान की भक्ति में लिप्त नहीं हो सकते, भले ही वे कितने भी व्यथित क्यों न हों। यह भी भगवद् गीता (7.15) में पुष्टि की गयी है। भगवान हरि अपने नित्य वाहक गरुड़ की पीठ पर एक ही बार प्रकट हुए, और हाथी को मुक्त कर दिया।

हाथी सर्वोच्च भगवान के साथ अपने संबंधों से परिचित था। उसने भगवान को आदि-पुरुष, या मूल भोगी के रूप में संबोधित किया। भगवान और सजीव दोनों ही सचेतन हैं और इस लिए भोगी हैं, लेकिन प्रभु मूल भोगी हैं क्योंकि वे सभी के निर्माता हैं। एक परिवार में पिता और उसके पुत्र निस्संदेह भोगी हैं, पर पिता मूल भोगी है, और पुत्र बाद में भोगी हैं। एक शुद्ध भक्त अच्छी तरह से जानता है कि ब्रह्मांड में सब कुछ भगवान की संपत्ति है और एक जीव उस चीज़ का आनंद उठा सकता है जिसे भगवान ने उसे दिया है। एक सजीव कोई भी चीज़ छू भी नहीं सकता जो उसके लिए नहीं है। मूल भोगी के इस विचार को ईशावास्योपनिषद में बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है। जो भगवान और स्वयं के बीच इस अंतर को जानता है वह कभी भी सबसे पहले भगवान को अर्पण किए बिना कुछ भी स्वीकार नहीं करता है।

हाथी ने भगवान को अखिल-लोक-नाथ, या ब्रह्मांड के प्रभु के रूप में संबोधित किया, जो इस लिए हाथी का भी प्रभु है। हाथी, भगवान का एक शुद्ध भक्त होने के नाते, विशेष रूप से मगरमच्छ के हमले से बचाए जाने का हकदार था, और क्योंकि भगवान का यह वादा है कि उनके भक्त को कभी भी नहीं मारा जाएगा, यह बिल्कुल उचित था कि हाथी ने भगवान को अपनी रक्षा के लिए पुकारा, और दयालु भगवान ने भी तुरंत प्रतिक्रिया दी। प्रभु सबकी रक्षा करने वाले हैं, लेकिन वे सबसे पहले उनकी रक्षा करते हैं जो भगवान की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं, न कि उन जैसे झूठे अभिमानी लोगों की जो भगवान की श्रेष्ठता को नकारते हैं या स्वयं को उनके बराबर होने का दावा करते हैं। वे हमेशा श्रेष्ठ हैं। भगवान का एक शुद्ध भक्त भगवान और स्वयं के बीच इस अंतर को जानता है। इसलिए एक शुद्ध भक्त को उसकी पूर्ण निर्भरता के कारण सर्वप्रथम वरीयता दी जाती है, जबकि वह व्यक्ति जो भगवान के अस्तित्व को नकारता है और स्वयं को भगवान घोषित करता है, उसे असुर कहा जाता है, और इसलिए, उसे भगवान की मंजूरी के अधीन सीमित शक्ति की ताकत से सुरक्षा दी जाती है। चूँकि प्रभु हर किसी से श्रेष्ठ हैं, इस लिए उनकी पूर्णता भी श्रेष्ठ है। कोई भी इसकी कल्पना नहीं कर सकता।

हाथी ने भगवान को तीर्थ-श्रवः के नाम से संबोधित किया या " तीर्थ स्थान के समान प्रसिद्ध " तीर्थ स्थानों तक लोग अज्ञात पाप कर्मों के प्रभाव से बचने के लिए जाते हैं | लेकिन कोई भी केवल उसके पवित्र नाम को स्मरण करके सभी पाप कर्मों के प्रभावों से मुक्त हो सकता है | अतः भगवान् तीर्थ स्थानों के समान ही अच्छे हैं | तीर्थ स्थान पर पहुँचने के बाद कोई भी अपने सभी पाप कर्मों के प्रभावों से मुक्त हो सकता है | लेकिन कोई भी केवल भगवान् का पवित्र नाम का जाप करके घर पर या किसी भी स्थान पर वही लाभ पा सकता है | एक शुद्ध भक्त को तीर्थ स्थान पर जाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है | वह केवल गंभीरता के साथ भगवान् के स्मरण द्वारा सभी पाप कर्मों से मुक्त हो सकता है | भगवान् के एक शुद्ध भक्त कभी कोई पाप कार्य नहीं करते | लेकिन क्यूंकि पूरा संसार पापी वातावरण से भरा हुआ है | एक शुद्ध भक्त भी कभी - कभी अनजाने में बिना विचारे ही पाप कर सकते हैं | जो जानबूझ कर पाप कार्य करता है | वह भगवान् का भक्त होने के योग्य नहीं हो सकता है | लेकिन एक शुद्ध भक्त जो अनजाने में कुछ पाप करता है | वह निश्चित रूप से भगवान् द्वारा छुड़ाया जाता है | क्यूंकि एक शुद्ध भक्त भगवान् को सदैव स्मरण करता है | भगवान् के पवित्र नाम को श्रवण - मंगल कहा जाता है | इसका मतलब है की आप केवल पवित्र नाम को सुनने से ही सब-कुछ शुभ प्राप्त कर सकते हैं | श्रीमद्भागवत में एक और जगह उनके पवित्र नाम को पुण्य श्रवण - कीर्तन के रूप में वर्णित किया गया है | अतः भगवान् के सभी के बारे में केवल जाप और श्रवण करना ही एक पवित्र कार्य है | भगवान् इस धरती पर अवतरित होते हैं और संसार के कार्यों के साथ दूसरों की तरह कार्य करते हैं | केवल उनके बारे में सुनने के लिए विषय बनाते हैं | अन्यथा भगवान् का इस संसार में कुछ करने के लिए नहीं है | न ही उनका कुछ करने का कोई दायित्व है | वह अपनी अकारण दया से बाहर आते हैं और अपनी इच्छानुसार कार्य करते हैं | वेद और पुराण उनके विभिन्न कार्यों के विवरणों से भरे हुए हैं | ताकि सामान्य लोग स्वाभाविक रूप से उनके कार्यों के बारे में कुछ सुनने और पढ़ने के लिए उत्सुक रहें | आमतौर पर संसार के आधुनिक उपन्यास और कहानियाँ लोगों के बहुमूल्य समय का अधिकांश हिस्सा ले लेते हैं | ऐसे साहित्य किसी के लिए भी अच्छाई नहीं कर सकते है | इसके विपरीत वे युवा मन को अनावश्यक रूप से उत्तेजित करते हैं | और तम भवबंध का मोड बढ़ाते हैं | जिससे भौतिक परिस्थितियों का बंधन बढ़ता जाता है | सुनने और पढ़ने के लिए वही रूचि भगवान् की गतिविधियों को सुनने और पढ़ने में बेहतर उपयोग की जा सकती है | यह हर तरह लाभ पहुंचाएगा | इसलिए निष्कर्ष यह है कि भगवान् का पवित्र नाम और उनसे सम्बंधित विषय हमेशा सुनने लायक होते हैं | और इसलिए यहाँ इस श्लोक में उन्हें नाम - धेय या वही जिन्हें पवित्र नाम का जाप करने के योग्य है | कहा गया है |

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)