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श्लोक 2.7.14  |
त्रैपिष्टपोरुभयहा स नृसिंहरूपं
कृत्वा भ्रमद्भ्रुकुटिदंष्ट्रकरालवक्त्रम् ।
दैत्येन्द्रमाशु गदयाभिपतन्तमारा-
दूरौ निपात्य विददार नखै: स्फुरन्तम् ॥ १४ ॥ |
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| अनुवाद |
| नृसिंहदेव के अवतार में श्रीभगवान ने देवताओं के भय का नाश करने के लिए दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध किया, जिसने गदा उठाकर भगवान को ललकारा था। भगवान ने उस दानव को अपनी जाँघों पर रखकर अपने नाखूनों से फाड़ डाला और क्रोध से भौंहें फड़काई तथा तीखे दाँत दिखाकर उसे डरावना रूप धारण किया। |
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| नृसिंहदेव के अवतार में श्रीभगवान ने देवताओं के भय का नाश करने के लिए दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध किया, जिसने गदा उठाकर भगवान को ललकारा था। भगवान ने उस दानव को अपनी जाँघों पर रखकर अपने नाखूनों से फाड़ डाला और क्रोध से भौंहें फड़काई तथा तीखे दाँत दिखाकर उसे डरावना रूप धारण किया। |
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