त्रैपिष्टपोरुभयहा स नृसिंहरूपं
कृत्वा भ्रमद्भ्रुकुटिदंष्ट्रकरालवक्त्रम् ।
दैत्येन्द्रमाशु गदयाभिपतन्तमारा-
दूरौ निपात्य विददार नखै: स्फुरन्तम् ॥ १४ ॥
अनुवाद
नृसिंहदेव के अवतार में श्रीभगवान ने देवताओं के भय का नाश करने के लिए दैत्यराज हिरण्यकशिपु का वध किया, जिसने गदा उठाकर भगवान को ललकारा था। भगवान ने उस दानव को अपनी जाँघों पर रखकर अपने नाखूनों से फाड़ डाला और क्रोध से भौंहें फड़काई तथा तीखे दाँत दिखाकर उसे डरावना रूप धारण किया।
Sri Bhagavan took the form of Narasimha Deva to end the indomitable fear of the gods. He held the king of the demons (Hiranyakashipu) on his thighs and tore him apart with his nails, who was challenging the Lord with a mace in his hand. At that time his eyebrows were twitching in anger and his face looked terrifying because of his teeth.
तात्पर्य
हिरण्यकश्यपु और उनके महाभक्त पुत्र प्रहलाद महाराज का इतिहास श्रीमद् भागवतम के सातवें सर्ग में वर्णित है। हिरण्यकश्यपु भौतिक उपलब्धियों से बहुत शक्तिशाली बन गया और ब्रह्माजी की कृपा से खुद को अमर समझता था। ब्रह्माजी ने उन्हें अमरता का वरदान देने से इनकार कर दिया क्योंकि वह स्वयं अमर नहीं है। पर हिरण्यकश्यपु ने चक्करदार तरीके से ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त कर लगभग अमर होने के समान पाया। हिरण्यकश्यपु को यकीन था कि वह न तो किसी मानव या देवता द्वारा मारा जाएगा और और न ही किसी ज्ञात हथियार से और न ही वह दिन या रात में मरेगा। हालाँकि, भगवान ने हिरण्यकश्यपु जैसे भौतिकवादी राक्षस की कल्पना से परे, नरसिंह रूप धारण किया, और इस प्रकार, ब्रह्माजी के वरदान को पूरा करते हुए, भगवान ने उसे मार डाला। भगवान ने उसे अपनी गोद में मार डाला, ताकि वह न तो जमीन पर मारा गया, न पानी पर और न ही आकाश में। राक्षस को नृसिंह के नाखूनों से छेदा गया, जो हिरण्यकश्यपु की कल्पना से परे मानवीय हथियार थे। हिरण्यकश्यपु का शाब्दिक अर्थ वह है जो सोने और मुलायम बिस्तर के पीछे है, जो सभी भौतिकवादी लोगों का अंतिम उद्देश्य है। ऐसे राक्षसी व्यक्ति, जिनका ईश्वर के साथ कोई संबंध नहीं होता है, धीरे-धीरे भौतिक संपत्ति से फूले नहीं समाते हैं और परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देने लगते हैं और उन लोगों को सताते हैं जो भगवान के भक्त हैं। प्रहलाद महाराज, हिरण्यकश्यपु का पुत्र था, और क्योंकि लड़का एक महान भक्त था, उसके पिता ने अपनी पूरी क्षमता के साथ उसे प्रताड़ित किया। इस अत्यधिक परिस्थिति में, भगवान ने नृसिंहदेव का अवतार लिया, और सिर्फ देवताओं के दुश्मन को ख़त्म करने के लिए, भगवान ने राक्षस की कल्पना से परे तरीके से हिरण्यकश्यपु को मार डाला। भगवान रहित राक्षसों की भौतिकवादी योजनाएँ हमेशा सर्वशक्तिमान भगवान द्वारा निराश की जाती हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥