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bhagavat 2.6.9: हे नारद, भगवान के विराट रूप का गुदाद्वार मृत्यु के नियामक देव, मित्र, का निवास स्थान है और भगवान की बृहदान्त्र का छोर ईर्ष्या, दुर्भाग्य, मृत्यु, नरक इत्यादि का स्थान माना जाता है।   |   bhagavat अध्याय 2.6: पुरुष सूक्त की पुष्टि   ।   bhagavat स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  2.6.9 
पायुर्यमस्य मित्रस्य परिमोक्षस्य नारद ।
हिंसाया निऋर्तेर्मृत्योर्निरयस्य गुदं स्मृत: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
हे नारद, भगवान के विराट रूप का गुदाद्वार मृत्यु के नियामक देव, मित्र, का निवास स्थान है और भगवान की बृहदान्त्र का छोर ईर्ष्या, दुर्भाग्य, मृत्यु, नरक इत्यादि का स्थान माना जाता है।
 
O Narada, the anus of the Lord's gigantic form is the abode of Mitra, the god of death, and the end of the Lord's large intestine is considered to be the place of jealousy, misfortune, death, hell, etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)