श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 2: ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति  »  अध्याय 6: पुरुष सूक्त की पुष्टि  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.6.5 
रोमाण्युद्भिज्जजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृत: ।
केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
उनके शरीर के रोम सभी प्रकार की वनस्पति के उद्गम हैं, खासकर उन पेड़ों के लिए जिनकी आवश्यकता यज्ञ की सामग्री (अवयवों) के रूप में होती है। उनके सिर और चेहरे के बाल बादलों के भंडार हैं और उनके नाखून बिजली, पत्थरों और लौह अयस्कों के जन्मस्थान हैं।
 
The hair on His body is the cause of all kinds of vegetation, especially the trees used as sacrificial offerings. The hair on His head and face are the reservoirs of clouds and His nails are the source of lightning, stones and iron ores.
तात्पर्य
भगवान के चमकीले नाखून से ही बिजली उत्पन्न होती है, और बादल उनके सिर के बालों पर ही टिके रहते हैं। इसलिए जीवन की सभी आवश्यकताएं व्यक्ति भगवान से ही पूरी कर सकता है और इसलिए वेदों में कहा गया है कि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह भगवान के कारण ही उत्पन्न होता है। भगवान सभी कारणों का परम कारण हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)