हे नारद, अब एक-एक करके लीला अवतार कहे जाने वाले भगवान के दिव्य अवतारों का वर्णन करूँगा। उनके कार्यों को सुनने से कानों में जमा सारी गंदगी साफ हो जाती है। ये लीलाएँ सुनने में मधुर और आनंददायक हैं, इसलिए वे हमेशा मेरे हृदय में रहती हैं।
O Narada, I shall now describe one by one the divine incarnations of the Lord, which are called lila avtaras. Hearing their activities removes all the dirt accumulated in the ears. These lila avtaras are sweet to hear and are delicious, so they always remain in my heart.
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद्-भागवतम (1.5.8) के प्रारम्भ में कहा गया है, कोई भी तब तक पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो सकता जब तक कि उसे भगवान की पारलौकिक गतिविधियों को सुनने का मौका न दिया जाए। इसलिए ब्रह्ाजी इस श्लोक में भी, भगवान के पारलौकिक लीलाओं को सुनाने के महत्व पर ज़ोर देने की कोशिश कर रहा है क्योंकि वह यहां भौतिक ग्रहों की सतह पर आते हैं और स्वयं को प्रकट करते हैं। प्रत्येक जीव में सुखद संदेश सुनने की प्रवृत्ति होती है, और जैसे, हममें से लगभग हर कोई रेडियो स्टेशनों द्वारा प्रसारित समाचार और वार्ता सुनने के लिए इच्छुक होता है। लेकिन कठिनाई यह है कि उन सभी संदेशों को सुनने से किसी का भी हृदय संतुष्ट नहीं होता है। इस असंतोष का कारण जीव आत्मा के अंतरतम स्तर के साथ संदेश की असंगति है। यह पारलौकिक साहित्य विशेष रूप से श्रील व्यासदेव द्वारा तैयार किया गया है ताकि भगवान की गतिविधियों के वर्णन द्वारा सामान्य लोगों को अत्यधिक संतुष्टि मिले, जैसा कि श्री नारद मुनि द्वारा श्रील व्यासदेव को निर्देश दिया गया था। भगवान की ऐसी गतिविधियाँ मुख्य रूप से दो प्रकार की होती हैं: एक भौतिक रचनात्मक शक्ति की सांसारिक अभिव्यक्ति से संबंधित है, और दूसरी समय और स्थान के संदर्भ में विभिन्न अवतारों के रूप में उनके लीलाओं से संबंधित है। नदी की लहरों की तरह लगातार अंदर और बाहर बहने वाले भगवान के असंख्य अवतार हैं। कम बुद्धिमान व्यक्ति भौतिक दुनिया में भगवान की रचनात्मक शक्तियों में अधिक रुचि लेते हैं, और भगवान के साथ अपने संबंध से अलग होने के कारण वे वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर सृष्टि के कई सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। हालाँकि, भगवान के भक्त अच्छी तरह से जानते हैं कि कैसे भगवान की भौतिक ऊर्जा की क्रिया और प्रतिक्रिया द्वारा रचनात्मक शक्तियां समवर्ती रूप से काम करती हैं। इसलिए वे भगवान की उन पारलौकिक गतिविधियों में अधिक रुचि लेते हैं जैसे कि वह भौतिक दुनिया की सतह पर खुद को अवतार लेते हैं। श्रीमद्-भागवतम भगवान की ऐसी गतिविधियों का इतिहास है, और जो लोग श्रीमद्-भागवतम को सुनने में रुचि लेते हैं, वे अपने दिलों को संचित सांसारिक गंदगी से साफ करते हैं। बाजार में एक हजार और एक कचरा साहित्य हैं, लेकिन जिसने भी श्रीमद्-भागवतम में रुचि ली है, वह ऐसे गंदे साहित्य में सारी रुचि खो देता है। श्री ब्रह्माजी इस प्रकार भगवान के प्रमुख अवतारों को इस प्रकार वर्णन करने का प्रयास कर रहे हैं कि उन्हें पारलौकिक अमृत के रूप में नारद द्वारा पिया जा सके।
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध दो के अंतर्गत छठा अध्याय समाप्त होता है ।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥